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लखनऊ भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद और भातखंडे संस्कृति विश्वविद्यालय की ओर से शुक्रवार को क्षितिज मासिक शृंखला के तहत सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया। यह कार्यक्रम कैसरबाग स्थित राय उमानाथ बली प्रेक्षागृह में किया गया। इसमें श्रीलंकाई कलाकारों ने नृत्य प्रस्तुतिया दी। इसमें परिषद से छात्रवृत्ति प्राप्त श्रीलंकाई छात्र-छात्राओं ने श्रीलंका की पारंपरिक नृत्य शैलियों में भारतीय शास्त्रीय और लोक नृत्य की झलक भी देखने को मिली। कार्यक्रम में नौ नृत्य प्रस्तुतियां शामिल की गईं। इसकी शुरुआत ‘मंगलम’ से हुई। यह श्रीलंका की पारंपरिक कैंडी नृत्य शैली पर आधारित है। इसके माध्यम से बुद्ध, धम्म और संघ यानी त्रिरत्न का आशीर्वाद मांगा जाता है। शिव वंदना से लेकर तमिल लोक नृत्य तक ने मोहा मन इसके बाद भरतनाट्यम शैली में ‘कीर्तनम’ प्रस्तुत किया गया। इसमें भाव-भंगिमाओं और पद संचालन के जरिए भक्ति भाव को दर्शाया गया। ‘गहका वन्नामा’ में श्रीलंका की कैंडियन नृत्य परंपरा की लय और मुद्राओं को प्रदर्शित किया गया। प्रस्तुतियों में ‘शिव वंदना एवं तराना’ भी शामिल रहा। इसमें भगवान शिव के प्रति भक्ति के साथ कथक की तकनीकी विशेषताओं को दर्शाया गया। ‘कुराती नृत्य’ के जरिए तमिल कुरावर समुदाय के जीवन, संस्कृति और परंपराओं की झलक दिखाई गई। भारत-श्रीलंका की सांस्कृतिक एकता का संदेश श्रीलंकाई नृत्य में वहां की पारंपरिक कैंडियन और लो कंट्री शैलियों से प्रेरित प्रस्तुति दी गई। वहीं, त्रिधारा में कैंडियन, लो कंट्री और सवारागामुवा नृत्य शैलियों का संगम देखने को मिला। कार्यक्रम में मल असना के जरिए श्रीलंका की लो कंट्री नृत्य परंपरा की अनुष्ठानिक विरासत को प्रस्तुत किया गया। समापन प्रणाम नृत्य से किया। इसमें भारत और श्रीलंका के ऐतिहासिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक संबंधों को दर्शाया गया। इन कलाकारों ने दी प्रस्तुति कार्यक्रम में इसुरु रुशन कपुदुवा, ए.डब्ल्यू.ए. चमीरा लक्षन और कवीश बंदारा दिसनायके ने हिस्सा लिया। इनके साथ वरुशिका पर्तिबन, एन.के. समंमाली, एच.डब्ल्यू.जी. यशिता जीवन और विजेसिंघे मिराशा मल्शानी विजेसिंघे ने भी नृत्य प्रस्तुतियां दीं।
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श्रीलंकाई कलाकारों ने लखनऊ में दी नृत्य प्रस्तुति:‘क्षितिज’ मासिक शृंखला में दिखी भारत-श्रीलंका की सांस्कृतिक एकता दिखी