उम्मीदवार की आपत्ति पर विशेषज्ञ राय जरूरी नहीं: हाईकोर्ट:नीट-यूजी : उत्तर कुंजी पर सवाल, कोर्ट ने याचिका खारिज की


इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि परीक्षा के विवादित प्रश्नों और उनके उत्तर विकल्पों को विशेषज्ञ के पास तभी भेजा जा सकता है, जब अदालत के सामने ऐसी ठोस सामग्री हो जो विशेषज्ञ राय लेने की जरूरत दिखाती हो। केवल एक उम्मीदवार की ओर से उत्तर कुंजी पर आपत्ति किए जाने और राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी द्वारा उसे जांचकर खारिज कर दिए जाने पर विशेषज्ञ से राय लेना जरूरी नहीं है।
जस्टिस अरिंदम सिन्हा और जस्टिस सत्यवीर सिंह की खंडपीठ ने नीट-यूजी 2026 के एक उम्मीदवार की याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। क्या है आपत्ति जानिये उम्मीदवार ने प्रश्न संख्या 60 और 70 की उत्तर कुंजी को चुनौती दी। इनमें एक शून्य-क्रम अभिक्रिया और दूसरा ऑक्सीजन की प्रथम आयनीकरण एन्थैल्पी से जुड़ा कथन-कारण प्रश्न था। याचिकाकर्ता नितिन मिश्रा का कहना था कि यही प्रश्न वर्ष 2019 और 2022 की संयुक्त प्रवेश परीक्षा मुख्य में भी पूछे गए, लेकिन उस समय उनकी उत्तर कुंजी में अलग उत्तर दिए गए। उसने दावा किया कि उसने उन्हीं उत्तरों को लिखा था। सुनवाई के दौरान अदालत के सवाल पर याचिकाकर्ता के वकील ने स्वीकार किया कि संभवतः वही अकेला उम्मीदवार था, जिसने इन दोनों प्रश्नों की उत्तर कुंजी पर आपत्ति की थी। हालांकि, उन्होंने दलील दी कि इससे अदालत की असाधारण शक्ति खत्म नहीं होती और अदालत प्रश्नों तथा उत्तर विकल्पों को विशेषज्ञ के पास भेज सकती है। क्या पेश की गईं दलींलें जानिये वकील ने कहा कि न तो वह और न ही याचिकाकर्ता विशेषज्ञ हैं। याचिकाकर्ता ने इन प्रश्नों के संबंध में अपने सेवानिवृत्त शिक्षक पिता से भी सलाह ली थी। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के वंशिका यादव बनाम भारत संघ मामले का हवाला दिया, जिसमें एक प्रश्न का सही उत्तर तय करने के लिए आई टी दिल्ली के निदेशक को तीन विशेषज्ञों की टीम गठित करने का निर्देश दिया गया। राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी की ओर से कहा गया कि उम्मीदवार ने उत्तर कुंजी पर आपत्ति दर्ज कराई, जिसे एजेंसी ने जांचने के बाद सही पाया और उसी उत्तर कुंजी को बरकरार रखा। एजेंसी ने सुप्रीम कोर्ट के यूपीपीएससी बनाम राहुल सिंह फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि उत्तर कुंजी को सही मानकर चलना चाहिए और अदालतों को शैक्षणिक मामलों में उत्तर पुस्तिकाओं की बारीकी से जांच से बचना चाहिए। संदेह की स्थिति में लाभ परीक्षा कराने वाली संस्था को दिया जाना चाहिए, उम्मीदवार को नहीं। कोर्ट ने सभी पक्षों को सुना हाईकोर्ट ने कहा कि याचिका दाखिल होने के समय भी उसने यह देखा कि बड़ी संख्या में परीक्षा देने वाले उम्मीदवारों में से केवल याचिकाकर्ता ही दोनों प्रश्नों के उत्तर को चुनौती दे रहा था। अदालत ने उसके वकील के लगातार आग्रह के कारण मामले पर आगे विचार किया। खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के दोनों फैसलों को साथ पढ़ते हुए कहा कि विशेषज्ञ के पास प्रश्न भेजने के लिए अदालत के सामने ऐसी सामग्री होनी चाहिए जो इस तरह के संदर्भ को उचित ठहराए। कोर्ट ने पहले के फैसले का अंतर समझाया हाईकोर्ट ने वंशिका यादव मामले से अंतर स्पष्ट करते हुए कहा कि उस मामले में राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी ने खुद अभ्यर्थियों की आपत्तियों पर विचार करते हुए दो विकल्पों को सही माना था और चार अंक दिए। इसके विपरीत मौजूदा मामले में अदालत के सामने केवल एक उम्मीदवार की आपत्ति थी, जिसे राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी पहले ही खारिज कर चुकी थी और किसी अन्य उम्मीदवार ने ऐसी आपत्ति नहीं उठाई।
खंडपीठ ने कहा, “हमारे सामने केवल एक उम्मीदवार का यह कहना है कि दोनों प्रश्न वर्ष 2019 और 2022 की संयुक्त प्रवेश परीक्षा में पहले पूछे जा चुके हैं। उसने आपत्ति उठाई, जिसे राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी ने खारिज कर दिया। कई अन्य उम्मीदवारों में से किसी ने ऐसी आपत्ति नहीं की। ऐसी स्थिति में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।” इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने नीट-यूजी 2026 के उम्मीदवार की याचिका खारिज कर दी।

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