JDU का नाम ‘जनता दल नीतीश’ करने का सुझाव देकर संजय झा ने बिहार की सियासत में हलचल मचा दी है। क्या निशांत कुमार को पार्टी सौंपने से पहले नीतीश की विरासत को लॉक करने का मास्टर प्लान है?
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आखिर नाम बदलने के पीछे का बड़ा गेम प्लान क्या है? क्या वाकई नाम बदलेगा, समझेंगे; बूझे की नाही में…।
सवाल-1ः JDU का नाम बदलने का पूरा मामला क्या है?
जवाबः 10 सितंबर को खगड़िया में ‘नीतीश संवाद’ कार्यक्रम के जनता दल यूनाइटेड (JDU) के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने पार्टी का नाम ‘जनता दल नीतीश’ करने का सुझाव दिया।
उन्होंने कहा, ‘नीतीश कुमार के राजनीतिक योगदान और विचारधारा को सम्मान देने के लिए जनता दल (यूनाइटेड) का नाम बदलकर ‘जनता दल (नीतीश)’ या ‘JD(U)-Nitish’ कर दिया जाना चाहिए।’
- अगले दिन 11 सितंबर को डिप्टी CM बिजेंद्र प्रसाद यादव ने कहा, ‘यह संजय झा की अपनी इच्छा है न! अच्छी इच्छा है। जब पार्टी के सामने औपचारिक प्रस्ताव आएगा, तब संगठन इस पर विचार और फैसला करेगा।’
- 11 सितंबर को JDU कोटे से मंत्री श्रवण कुमार ने कहा, ‘JDU पूरी तरह नीतीश कुमार के नाम और काम पर ही चल रही है। नीतीश कुमार पार्टी के सर्वमान्य नेता, ‘विकास पुरुष’ और ‘विश्वकर्मा’ हैं। पार्टी के नाम में उनका नाम जुड़ना चाहिए और इसे बैठक में सर्वसम्मति से पारित किया जाना चाहिए।’
- 13 सितंबर को X पर बिहार JDU अध्यक्ष उमेश कुशवाहा ने लिखा, ‘संजय झा ने जो भावना व्यक्त की है, वह JDU के प्रत्येक कार्यकर्ता की भावना है। नीतीश कुमार ही हमारी पार्टी की सबसे बड़ी पूंजी हैं। संजय झा के साथ हम पूरी मजबूती से खड़े हैं। किंतु-परंतु का सवाल नहीं है।’
सवाल-2ः संजय झा का बयान क्या पार्टी में टूट की तरफ इशारा है?
जवाबः बिल्कुल नहीं है। सूत्रों के मुताबिक, JDU में सब ठीक है। पार्टी पूरी तरह एकजुट है। अगर टूट या गुटबाजी होती तो संजय झा के इस सुझाव का विरोध होता। लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है। अब तक किसी नेता ने इस पर कोई टिका-टिप्पणी नहीं की है।
दरअसल…
पॉलिटिकल एनालिस्ट अभिरंजन कुमार कहते हैं, ‘नीतीश कुमार राज्यसभा जाने के बाद राजनीति से लगभग रिटायर हो गए हैं। निशांत कुमार आगे की राजनीति करेंगे। यह डिमांड संजय झा ने की है।’
अभिरंजन कुमार कहते हैं, ‘चूंकि मार्च में जब नीतीश कुमार ने राज्यसभा जाने का ऐलान किया तब से पार्टी के पुराने कार्यकर्ता और नीतीश समर्थक संजय झा सहित उनके इर्दगिर्द के नेताओं से अंदरखाने नाराज हैं। वह मानते हैं कि मुख्यमंत्री पद छुड़वाने में इन लोगों का हाथ है। इसी दाग को कम करने के लिए संजय झा ने सार्वजनिक रूप से यह दांव चला है।’

सवाल-3: आखिर JDU का नाम क्यों बदलना चाहते हैं नेता?
जवाबः इसके पीछे 3 बड़ी स्ट्रेटजी है। सिलसिलेवार तरीके से जानिए…
1. विरासत की लड़ाई खत्म होगी, निशांत की राह आसान होगी
सूत्रों के मुताबिक, नीतीश कुमार के बिहार से दिल्ली जाने के बाद उनकी विरासत को लेकर अंदरखाने बहुत खींचतान है। समय-समय पर राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा उनकी विरासत पर दावा करते हैं। नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद CM बने सम्राट चौधरी स्वभाविक उत्तराधिकारी के तौर पर उभरे हैं।
- चुनावी रणनीतिकारों का मानना है कि अगर जनता दल यूनाइटेड के नाम में नीतीश कुमार जुड़ जाएगा तो लोगों के बीच सीधा मैसेज जाएगा कि इस पार्टी का प्रमुख ही नीतीश कुमार की विरासत का हकदार है। यह पोस्ट नीतीश ऐरा (नीतीश के जाने के बाद) में निशांत कुमार की राजनीति की राह को काफी हद तक आसान कर देगा।
- रणनीतिकारों का मानना है कि JDU जब 2003 में बनी थी तो उस वक्त नीतीश कुमार के साथ दिवंगत जॉर्ज फर्नांडिस, शरद यादव सरीखे कई नेता थे। आज भी समय-समय पर कुछ नेता बयान देते रहते हैं कि हमने भी JDU को खून-पसीना से सींचा है।
- चुनावी रणनीतिकारों की मानें तो जब JDU का नाम ‘जनता दल नीतीश’ हो जाएगा तो उन सभी नेताओं के दावे अपने-आप खारिज हो जाएंगे, जो खुद को विरासत का हकदार समझते हैं। चूंकि निशांत कुमार जल्द ही पार्टी की बागडोर संभालने वाले हैं। उससे पहले यह सब हो जाएगा।
- निशांत कुमार के पार्टी संभालने की तस्दीक 8 सितंबर को बेगूसराय में संजय झा ने भी दी थी। उन्होंने कहा था, ‘पार्टी के आगे का भविष्य तय हो चुका है। निशांत कुमार अभी सरकार में मंत्री के तौर पर काम कर रहे हैं। आगे संगठन की जिम्मेदारी संभालेंगे।’
2. ब्रांड नीतीश को मजबूत कर फायदा उठाना
बिहार में JDU का आधार ही नीतीश कुमार की ‘सुशासन’ और विकास पुरुष वाली छवि है। पार्टी का मानना है कि ‘जनता दल’ शब्द तो पहले के कई धड़ों (जैसे जनता दल सेक्युलर, जनता दल यूनाइटेड) के पास रहा है, लेकिन ‘नीतीश’ जोड़ने से पार्टी की अपनी अलग पहचान स्थापित होगी। रणनीतिकार इसके 2 बड़े उदाहरण बताते हैं…
पहला- बीजू जनता दल (BJD)
- बीजू पटनायक ओडिशा के बड़े कद्दावर नेता थे। एक बार कांग्रेस और एक बार जनता पार्टी से मुख्यमंत्री रहे। निधन से पहले वह जनता दल में थे। ओडिशा में जनता दल उनकी बदौलत जानी-पहचानी जाती थी।
- अप्रैल 1997 में उनका निधन हो गया। उस वक्त जनता दल में भारी खींचतान मची थी। निधन के बाद उनके बेटे नवीन पटनायक को लोकल नेता राजनीति में लेकर आए। लेकिन पार्टी के भीतर भारी गहमागहमी थी।
- दिसंबर 1996 में नवीन पटनायक ने अपने पिता बीजू पटनायक के नाम पर बीजू जनता दल बना ली। वह पार्टी के सर्वेसर्वा हो गए।
- पार्टी से पिता का नाम जुड़ते ही उनका पूरा जनाधार नवीन पटनायक के साथ आ गया और वह 4 साल बाद मने 2000 में हुए ओडिशा विधानसभा चुनाव में जीत गए। नवीन पटनायक लगातार 24 सालों तक मुख्यमंत्री रहे।
दूसरा- वाईएसआर कांग्रेस (YSRCP)
- वाईएस राजशेखर रेड्डी आंध्र प्रदेश कांग्रेस के बड़े नेता थे। मुख्यमंत्री रहने के दौरान ही सितंबर 2009 में विमान दुर्घटना में उनका निधन हो गया। उसके बाद कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद को लेकर भारी खींचतान हुई।
- वाईएस राजशेखर रेड्डी के बेटे वाईएस जगन मोहन रेड्डी ने कांग्रेस आलाकमान से मुख्यमंत्री बनाने की मांग की। कांग्रेस ने बात नहीं मानी। उन्हें पार्टी में दरकिनार कर दिया गया। मार्च 2011 में जगन मोहन रेड्डी ने अपने पिता के नाम पर वाईएसआर कांग्रेस (YSRCP) पार्टी बनाई।
- 2014 विधानसभा चुनाव में ना कांग्रेस जीती और ना ही जगन मोहन जीते। लेकिन कांग्रेस से वाईएस राजशेखर रेड्डी का नाम हटने से राज्य से पूरी तरह साफ हो गई। जगन की पार्टी मुख्य विरोधी पार्टी बन गई। 2019 में जगन चुनाव जीते और मुख्यमंत्री बने।
JDU के रणनीतिकार और नेता ओडिशा के नवीन पटनायक मॉडल से खुद की पार्टी और निशांत कुमार की राजनीतिक स्थिति को जोड़ते हैं। उन्हें उम्मीद है कि नीतीश कुमार का नाम जुड़ने से पार्टी मजबूत होगी।

पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार लगातार स्वास्थ्य विभाग को पटरी पर लाने का प्रयास कर रहे हैं। वह समय-समय पर अपने पिता से मार्गदर्शन भी ले रहे हैं।
3. वोट बैंक और पार्टी एकजुट रहेगी
अंदरखाने पार्टी का मानना है कि वोटर JDU से ज्यादा ‘नीतीश कुमार’ से जुड़े हैं। पार्टी के नाम में स्पष्टता आने से ग्रामीण और कम पढ़े-लिखे वोटरों के लिए पार्टी की पहचान बहुत आसान और सीधी हो जाएगी।
पॉलिटिकल एनालिस्ट अभिरंजन कुमार कहते हैं, ‘नीतीश कुमार के बाद पार्टी में बिखराव की आशंकाओं को रोकने के लिए नाम में ही उनका ठप्पा लगा दिया जा रहा है। इससे भविष्य में कोई भी नया नेता पार्टी पर अपना दावा करे, तो नीतीश कुमार की विरासत के तहत ही काम करना पड़ेगा।’
सवाल-4: क्या वाकई JDU का नाम बदलेगा?
जवाबः ज्यादा संभव है। चूंकि अब तक किसी नेता ने इससे इनकार नहीं किया है। खास बात है कि पार्टी सुप्रीमो नीतीश कुमार, उनके बेटे निशांत कुमार, केंद्रीय मंत्री ललन सिंह सरीखे कई सीनियर नेताओं ने इस पर अभी तक कोई टिका-टिप्पणी नहीं की है।
13 सितंबर के बिहार JDU अध्यक्ष उमेश कुशवाहा के पोस्ट से साफ संकेत है कि पार्टी के अंदर नाम बदलने पर लगभग आम सहमति है।
सवाल-5ः क्या सिर्फ बयान देने से नाम बदल जाएगा, प्रोसेस क्या है?
जवाबः नहीं। नेताओं के सिर्फ बयान देने से पार्टी का नाम नहीं बदल जाएगा।
JDU के संविधान के मुताबिक, पार्टी के नाम, उद्देश्य या नीति-नियमों में परिवर्तन करने की शक्ति केवल पार्टी की राष्ट्रीय परिषद के पास है। नाम बदलने के लिए 6 स्टेप्स हैं…
- सबसे पहले पार्टी का कोई किसी सीनियर पदाधिकारी नाम बदलने का लिखित प्रस्ताव राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सामने पेश करेगा। राष्ट्रीय कार्यकारिणी इस प्रस्ताव पर चर्चा करेगी। फिर इसे मंजूरी देकर ‘राष्ट्रीय परिषद’ को भेजेगी।
- इसके बाद राष्ट्रीय परिषद की विशेष बैठक बुलाई जाएगी, जिसमें मौजूद सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई (2/3) बहुमत से प्रस्ताव पारित होना आवश्यक है।
- प्रस्ताव पारित होने के बाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार इस पर अपनी अंतिम रूप से अपनी स्वीकृति देंगे।
- इसके बाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष/महासचिव चुनाव आयोग को नया नाम दर्ज करने के लिए लिखित आवेदन भेजेंगे। साथ में राष्ट्रीय परिषद से पारित प्रस्ताव की सत्यापित कॉपी, पार्टी के संशोधित संविधान की कॉपी और उपस्थित सदस्यों की सूची जमा करनी होगी।
- इसके बाद आयोग पार्टी को दो राष्ट्रीय समाचार पत्रों (एक अंग्रेजी और एक स्थानीय/हिंदी) में प्रस्तावित नए नाम का विज्ञापन जारी करने का निर्देश देगा।
- आम जनता या अन्य राजनीतिक दलों को आपत्ति दर्ज कराने के लिए 30 दिनों का समय देगा। यदि 30 दिनों में कोई ठोस आपत्ति नहीं मिली और नया नाम किसी अन्य रजिस्टर्ड दल से मेल नहीं खाएगा, तो आयोग नए नाम को आधिकारिक रूप से रजिस्टर्ड कर लेगा। इसके बाद पार्टी नया नाम इस्तेमाल कर सकेगी।

तस्वीर 9 सितंबर के खगड़िया नीतीश संवाद की है। जहां संजय झा ने पार्टी का नाम बदलने का सुझाव दिया था।
सवाल-6: …तो क्या पार्टी का सिंबल तीर भी बदलेगा?
जवाबः नहीं। राजनीतिक दल का नाम बदलने पर पार्टी का पुराना चुनाव चिह्न अपने आप खत्म नहीं होता है।
भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 और चुनाव चिह्न (आरक्षण व आवंटन) आदेश, 1968 के तहत नियम स्पष्ट हैं…
- यदि कोई दल बिना किसी टूट या विलय के केवल अपना आधिकारिक नाम बदलता है तो चुनाव आयोग की मंजूरी के बाद नया नाम दर्ज हो जाता है।
- यदि दल आयोग की शर्तों को पूरा करता है, तो उसे वही पुराना चुनाव चिह्न नए नाम के तहत भी इस्तेमाल करने की अनुमति मिल जाती है।
सिंबल जब्त तब होता है…
जब किसी पार्टी में दो गुट बन जाते हैं और दोनों मूल पार्टी के नाम और चिह्न पर दावा करते हैं, तब चुनाव आयोग चिह्न को फ्रीज (जब्त) कर सकता है। इसके बाद दोनों गुटों को नए नाम और नए चुनाव चिह्न आवंटित किए जाते हैं।
जैसे- लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) का मामला है। 2021 में चिराग पासवान की पार्टी दो गुटों में बंट गई। चिराग गुट और पारस गुट। दोनों ने लोक जनशक्ति पार्टी पर अपना-अपना दावा पेश किया। नतीजा-नाम और सिंबल दोनों जब्त हो गया। अब दोनों अलग-अलग सिंबल और पार्टी के नाम से चुनावी मैदान में हैं।
JDU में अभी तक ऐसा कोई मामला नहीं है। इसलिए सिंबल बरकरार रहेगा।