प्रयागराज के कई मोहल्लों में क्यों हुआ जलभराव:3 दिन की बारिश में सड़कें बनीं तालाब, घर-दफ्तर जलमग्न; विशेषज्ञ ने बताए के 5 बड़े कारण


प्रयागराज में 17 से 20 अगस्त के बीच महज चार दिनों में हुई 308.1 मिमी बारिश ने प्रयागराज की जल निकासी व्यवस्था की हकीकत सामने ला दी। स्मार्ट सिटी और महाकुंभ की तैयारियों पर करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद शहर के कई इलाके पानी में डूब गए। सड़कें तालाब बन गईं, थाने और सरकारी दफ्तर जलमग्न हो गए, जबकि वीआईपी क्षेत्रों में भी लोगों को जलभराव की परेशानी झेलनी पड़ी। बारिश थमने और पानी उतरने के बाद भी लोगों के मन में एक सवाल बना हुआ है कि आखिर हर साल प्रयागराज को जलभराव की समस्या का सामना क्यों करना पड़ता है? फिलहाल, जलभराव का संकट टल चुका है और पानी उतर गया है, लेकिन लोगों के जेहन में एक कसक और बड़ा सवाल अब भी कायम है। आखिर यह जलभराव की मार इस शहर को हर बार क्यों झेलनी पड़ती है? इस गंभीर समस्या की तह तक जाने के लिए दैनिक भास्कर के रिपोर्टर ने प्रयागराज के जाने-माने सिविल इंजीनियर डॉ. अतुल जायसवाल से खास बातचीत की। उन्होंने वैज्ञानिक और तकनीकी पहलुओं के आधार पर जलभराव के 5 मुख्य कारण गिनाए हैं। आइए पांच प्वाइंट में समझते हैं जलभराव के कारण… 1. बारिश से ठीक पहले नालों की सफाई में भीषण लापरवाही
मौसम विभाग के आंकड़े गवाह हैं कि 17 अगस्त को 73.4 मिमी, 18 अगस्त को 67.7 मिमी, 19 अगस्त को 119.8 मिमी और 20 अगस्त को 47.2 मिमी बारिश हुई, जिसके बाद 23 अगस्त को भी 62 मिमी पानी बरसा। इस भारी बारिश ने जॉर्ज टाउन, टैगोर टाउन, अल्लापुर, मुंडेरा और करेली जैसे इलाकों को डुबो दिया। नगर निगम ने मानसून से पहले नालों की सफाई के नाम पर करोड़ों रुपये के ठेके तो दे दिए, लेकिन धरातल पर उसकी कोई मॉनिटरिंग (निगरानी) नहीं की गई। नतीजा यह हुआ कि ठेकेदारों ने खानापूर्ति की और जब आसमान से आफत बरसी, तो उफनते नालों ने घरों को जलमग्न कर दिया। 2. सीवर में नालों का कनेक्शन और बढ़ता कचरा
डॉ. अतुल जायसवाल ने बताया कि हमारे शहर की नगर नियोजन (टाउन प्लानिंग) व्यवस्था में दूरदर्शिता की भारी कमी है। सबसे बड़ी गड़बड़ी यह की गई है कि सीवर लाइनों में सीधे नालों के कनेक्शन जोड़ दिए गए हैं। इन नालों के पानी के साथ भारी मात्रा में पॉलीथिन और कचरा भी सीवर में बहकर जा रहा है, जो आगे जाकर पाइपलाइनों को पूरी तरह चोक कर रहा है। कायदे से सीवर और नाले का नेटवर्क अलग होना चाहिए। इसके अलावा, मोहल्लों से नियमित कूड़ा न उठने के कारण लोग मजबूरन नालियों में कचरा फेंकते हैं। लगभग हर मोहल्ले में संचालित डेयरियों का गोबर भी सीधे नालियों में बहाया जाता है, जो जल निकासी के रास्तों को ब्लॉक कर देता है। 3. नई सीवर लाइनों का जाल, लेकिन कनेक्शन का अभाव
शहर के विस्तारित क्षेत्रों और पुराने मोहल्लों में सीवर लाइन बिछाने का काम 2014 से ‘गंगा प्रदूषण नियंत्रण इकाई’ लगातार कर रही है। नई लाइनें बिछाकर उन्हें सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) तक पहुंचाने के लिए अब तक 2500 करोड़ रुपये से अधिक की भारी-भरकम राशि खर्च की जा चुकी है। विडंबना यह है कि करोड़ों खर्च करने के बाद भी धरातल पर योजना अधूरी है। नई बनी सीवर लाइनों में ज्यादातर मोहल्लों और घरों के मुख्य कनेक्शन जोड़े ही नहीं गए हैं। यही वजह है कि कई इलाकों का गंदा पानी चाहकर भी बाहर नहीं निकल पाता। कई जगहों पर पाइपलाइन के ढलान (Level) का स्तर भी तकनीकी रूप से गड़बड़ है, जिससे पानी आगे बढ़ने के बजाय वहीं ठहर जाता है। 4. नालों पर बेखौफ अवैध कब्जे और घटती चौड़ाई
तीन तरफ से गंगा और यमुना से घिरे प्रयागराज शहर की पुरानी जल निकासी व्यवस्था अंग्रेजों के जमाने की है। प्रयागराज जंक्शन के दक्षिण के मोहल्लों का पानी नालों के रास्ते यमुना में गिरता है, जबकि उत्तर में स्थित सिविल लाइन्स और कटरा जैसे इलाकों का पानी गंगा में जाता है। इसके लिए शहर में 15 से 20 फीट चौड़े बड़े नाले बनाए गए थे। जैसे-जैसे आबादी बढ़ी, इन नालों पर लोगों की नजरें टेढ़ी हो गईं। जिसके घर के पीछे से नाला गुजरा, उसने 5 से 10 फीट तक अतिक्रमण कर उस पर पक्के निर्माण और दुकानें तक खड़ी कर लीं। खुल्दाबाद, बेनीगंज, मालवीय नगर, मीरापुर, जीटीबी नगर, दरियाबाद, करेली, सिविल लाइन्स, कटरा, मंफोर्डगंज, अशोक नगर, राजापुर, जॉर्ज टाउन, टैगोर टाउन, सोहबतियाबाग, बघाड़ा, तेलियरगंज, गोविंदपुर और शिवकुटी लगभग हर मोहल्ले का यही हाल है। नालों के सिकुड़ जाने के कारण नगर निगम चाहकर भी इनकी सफाई नहीं कर पाता और बारिश में जलभराव तय है। 5. प्राकृतिक जल स्रोतों और तालाबों का वजूद मिटाना
शहर में ऊंचाई पर बसे इलाकों की बात करें तो प्रयागराज जंक्शन, खुल्दाबाद, कोतवाली, चौक घंटाघर, बहादुरगंज, सिविल लाइन्स और कटरा ऊपर की तरफ हैं। जंक्शन के दक्षिण का पानी खुल्दाबाद से होते हुए करेली और करेलाबाग के निचले इलाकों से गुजरकर यमुना में गिरता है। करेली, करेलाबाग, अल्लापुर, जॉर्ज टाउन, टैगोर टाउन, राजापुर, नेवादा, गोविंदपुर, सलोरी और बघाड़ा जैसे इलाके निचले हिस्से में आते हैं। यहां पहले बड़े-बड़े तालाब और खाली जमीनें हुआ करती थीं, जो बारिश के अतिरिक्त पानी को प्राकृतिक रूप से सोख लेती थीं। लेकिन भूमाफियाओं और स्थानीय लोगों ने इन तालाबों और खाली जमीनों पर बड़े-बड़े मकान तान दिए। इसका एक जीवंत उदाहरण जॉर्ज टाउन में संगम पेट्रोल पंप के पास देखा जा सकता है, जहां पहले खाली जमीन पर पानी ठहरता था। यहाँ से निकलने वाला नाला 20 फीट से अधिक चौड़ा है, जो रेलवे लाइन पार कर सोहबतियाबाग की ओर जाता है। लेकिन जैसे ही यह नाला रेलवे लाइन पार करता है, अतिक्रमण की वजह से इसकी चौड़ाई आधी से भी कम रह जाती है। पानी के आगे निकलने का रास्ता ब्लॉक होने के कारण ही पूरा इलाका तालाब में तब्दील हो गया था।

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