संभल हिंसा रिपोर्ट में बड़ा खुलासा:10 मिनट के भाषण से भड़की भीड़, आयोग ने सांसद बर्क समेत कई लोगों को ठहराया जिम्मेदार


संभल में आयोग की 450 पन्नों की रिपोर्ट ने 24 नवंबर 2024 को हुई हिंसा की कई परतें खोल दी हैं। आयोग ने अपनी जांच में समाजवादी पार्टी के सांसद जियाउर्रहमान बर्क, विधायक पुत्र सुहैल इकबाल, जामा मस्जिद के पदाधिकारियों समेत कई लोगों की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि सर्वे से पहले दिए गए भाषण, सोशल मीडिया के जरिए भीड़ जुटाने की कोशिश और बाहरी तत्वों की सक्रियता ने हालात को हिंसा तक पहुंचा दिया। संभल हिंसा की शुरुआत 19 नवंबर 2024 को हुई, जब हिंदू पक्ष ने चंदौसी की सिविल कोर्ट में शाही जामा मस्जिद को श्रीहरिहर मंदिर होने का दावा पेश किया। उसी दिन कोर्ट के आदेश पर मस्जिद का पहला सर्वे कराया गया। इसके बाद 22 नवंबर को जुमे की नमाज के बाद जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर सांसद जियाउर्रहमान बर्क ने लोगों को संबोधित किया। आयोग की रिपोर्ट में इस भाषण का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि इसमें “मस्जिद है, मस्जिद थी और मस्जिद रहेगी” जैसे बयान दिए गए, जिसने माहौल को और गर्म किया। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि 21 नवंबर को सांसद के नाम से व्हाट्सएप ग्रुप बनाए गए, जिनके जरिए 22 नवंबर की नमाज में ज्यादा से ज्यादा लोगों को आने की अपील की गई। ‘मन्नत’ नाम के एक अन्य ग्रुप का भी जिक्र रिपोर्ट में किया गया है। आयोग ने साजिश की ओर किया इशारा रिपोर्ट के मुताबिक 24 नवंबर 2024 की सुबह करीब 7:35 बजे कोर्ट कमिश्नर सर्वे के लिए पहुंचे थे। कुछ ही देर बाद बड़ी संख्या में लोग मौके पर जमा होने लगे। आयोग का दावा है कि सुबह करीब 8:40 बजे तक 10 हजार से ज्यादा लोग वहां पहुंच गए और इसके बाद पुलिस पर पथराव और फायरिंग शुरू हो गई।
आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि हिंसा केवल अचानक नहीं हुई, बल्कि इसके पीछे सुनियोजित साजिश के संकेत मिले हैं। रिपोर्ट में फरार गैंगस्टर शारिक साठा का नाम भी सामने आया है। आयोग ने कहा है कि कुछ बाहरी चेहरे भी हिंसा में सक्रिय थे। जांच के दौरान पुलिस अधिकारियों के बयानों और सर्च ऑपरेशन का भी उल्लेख किया गया है, जिसमें घटनास्थल से विदेशी निर्मित कारतूस मिलने की बात दर्ज है। मस्जिद पदाधिकारी और कई अन्य नाम भी रिपोर्ट में शामिल त्रिस्तरीय आयोग ने अपनी जांच के दौरान कुल 199 लोगों के बयान दर्ज किए। इनमें प्रशासनिक अधिकारी, पुलिस अधिकारी, प्रत्यक्षदर्शी, पीड़ित परिवार और पुराने दंगों से जुड़े लोगों के बयान भी शामिल हैं। रिपोर्ट में सांसद जियाउर्रहमान बर्क के अलावा विधायक पुत्र सुहैल इकबाल, जामा मस्जिद के सदर जफर अली, सचिव मशहूद अली फारूखी, एडवोकेट कासिम जमाल और मस्जिद के दिवंगत उपाध्यक्ष लड्डन खान का भी जिक्र किया गया है। आयोग ने 1936 से लेकर 2024 तक संभल में हुए सांप्रदायिक दंगों का भी अध्ययन किया और वर्ष 1978 के दंगे समेत कई घटनाओं के पीड़ित परिवारों के बयान दर्ज किए। एक साल की जांच के बाद सरकार को सौंपी रिपोर्ट हिंसा के बाद आयोग ने कई चरणों में संभल का दौरा किया। 1 दिसंबर 2024 को आयोग ने पहली बार हिंसा प्रभावित इलाकों का निरीक्षण किया। इसके बाद जनवरी और फरवरी 2025 में गवाहों, अधिकारियों और पक्षकारों के बयान दर्ज किए गए। तत्कालीन जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक और अन्य अधिकारियों से भी विस्तृत पूछताछ की गई। 5 अगस्त 2025 को आयोग ने अपनी रिपोर्ट उत्तर प्रदेश सरकार को सौंप दी थी। एक वर्ष बाद, 5 अगस्त 2026 को विधानसभा सत्र के दौरान सरकार ने इस रिपोर्ट को अनुपूरक बजट के साथ सदन में पेश किया। गौरतलब है कि 24 नवंबर 2024 की हिंसा में पांच लोगों की मौत हुई थी और पुलिस के कई अधिकारी घायल हुए थे। इस मामले में कुल 12 एफआईआर दर्ज हुई थीं, जिनमें 2,750 से अधिक लोगों को आरोपी बनाया गया। पुलिस जांच के दौरान कई आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया, जबकि कुछ आरोपियों को बाद में अदालतों से जमानत भी मिल चुकी है। आयोग की रिपोर्ट सामने आने के बाद अब इस पूरे मामले में आगे की कानूनी और प्रशासनिक कार्रवाई पर सबकी नजरें टिकी हैं।

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