मथुरा-वृंदावन में भीड़ प्रबंधन विज्ञान पर आधारित नहीं- हाईकोर्ट:कोर्ट बोला- भगदड़ जैसी घटनाएं चूक नहीं, राज्य सरकार को अहम सिफारिशें


इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अवैध निर्माण से जुड़े मामले की सुनवाई करते हुए इसका दायरा बढ़ाकर मथुरा-वृंदावन में भीड़ प्रबंधन की गंभीर खामियों पर केंद्रित कर दिया है। इन खामियों को दुरुस्त करने की राज्य सरकार को शिफारिश भी की है। न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकल पीठ ने कहा कि धार्मिक आयोजनों और तीर्थस्थलों पर होने वाली भगदड़ जैसी घटनाएं केवल प्रशासनिक चूक या ढांचागत कमी का नतीजा नहीं, बल्कि भीड़ के व्यवहार-विज्ञान की गहरी अनदेखी का परिणाम है। स्वामी शिव स्वरूपानंद महाराज की याचिका यह याचिका मूल रूप से स्वामी शिव स्वरूपानंद जी महाराज ने वृंदावन में अपनी भूमि पर आश्रम निर्माण से जुड़े ध्वस्तीकरण आदेश के खिलाफ दायर की थी। कोर्ट कमिश्नर, आगरा मंडल के 4 सितंबर 2025 के आदेश की वैधता परख रहा था, जिसमें याचिकाकर्ता की अपील खारिज कर दी गई थी। सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि 23 अवैध निर्माणों में से चुनिंदा लोगों पर ही कार्रवाई हुई, जिसे “पिक एंड चूज़” कहकर चुनौती दी गई। कोर्ट ने याद किया मथुरा-वृंदावन में भगदड़ जैसी घटनाएं मामले की सुनवाई के दौरान अदालत को याद आया कि हाल के वर्षों में होली से पहले और अन्य पर्वों पर मथुरा-वृंदावन में भगदड़ जैसी घटनाएं हुई हैं, जिनमें लोग घायल हुए और जानें भी गईं। इसी संदर्भ में कोर्ट ने मथुरा वृंदावन विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष, जिलाधिकारी मथुरा, नगर आयुक्त और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक से विस्तृत हलफनामे तलब किए। प्राधिकरण के हलफनामे के अनुसार पिछले पांच वर्षों (2021-22 से 2025-26) में अवैध निर्माण के खिलाफ 2,453 नोटिस जारी हुए, जिनमें से 700 ध्वस्तीकरण आदेश पारित हुए, पर केवल 323 पर अमल हो सका। 104 संपत्तियां सील की गईं जबकि 212 मामलों का समझौता (कंपाउंडिंग) कर लिया गया। कोर्ट ने इन आंकड़ों को “हिमशैल का सिरा” बताते हुए कहा कि असली समस्या कहीं अधिक गंभीर है। भीड़ प्रबंधन यातायात प्रबंधक तक ही अदालत ने कहा कि मथुरा में भीड़ प्रबंधन को महज यातायात प्रबंधन तक सीमित कर दिया गया है, जो भीड़ के व्यवहार-विज्ञान की मौलिक गलतफहमी दर्शाता है। कोर्ट ने रेखांकित किया कि धार्मिक भीड़ राजनीतिक रैली या खेल आयोजन की भीड़ से गुणात्मक रूप से भिन्न होती है । यह स्वतः-नियंत्रित तो होती है, पर भावनात्मक तल्लीनता के कारण घनत्व बढ़ने पर खतरे के प्रति कम सजग रहती है। कोर्ट ने भीड़ विज्ञान के अध्ययनों का हवाला देते हुए कहा कि प्रति वर्ग मीटर 4-5 व्यक्तियों के घनत्व पर व्यक्ति का स्वयं का नियंत्रण खत्म हो जाता है, और 6-7 व्यक्ति प्रति वर्ग मीटर पर दम घुटने जैसी स्थिति (कम्प्रेसिव एस्फिक्सिया) का गंभीर खतरा पैदा हो जाता है — यह स्तर भारत के प्रमुख तीर्थस्थलों पर अक्सर देखा जाता है। साधारण शहरों की तरह नहीं देख सकते कोर्ट ने कहा कि हजारों साल पुरानी सांस्कृतिक विरासत वाले मथुरा शहर का विकास खाका महज दस वर्षों के लिए तैयार किया गया है, जबकि चंडीगढ़, नई दिल्ली और जयपुर जैसे शहर दशकों पहले दीर्घकालिक दूरदृष्टि के साथ बसाए गए थे। अदालत ने कहा कि मथुरा, अयोध्या, वाराणसी और चित्रकूट जैसे शहरों को अन्य साधारण शहरों के समान नहीं आंका जा सकता। कोर्ट ने तीर्थ नगरों में अवैध निर्माण को केवल गरीबी या अज्ञानता का नतीजा नहीं बल्कि भू-माफिया, बिल्डर और राजनीतिक संरक्षण के गठजोड़ से उपजी संगठित अनियमितता करार दिया, जिसे रोकने के लिए कड़े कानूनों से ज्यादा मजबूत और निष्पक्ष संस्थागत इच्छाशक्ति की जरूरत है। कोर्ट ने राज्य सरकार को कुछ सिफारिशें की है – – प्रदेश के विश्वविद्यालयों में शहरी नियोजन, आपदा प्रबंधन, सिविल इंजीनियरिंग व मनोविज्ञान जैसे पाठ्यक्रमों में भीड़-व्यवहार विज्ञान को औपचारिक विषय के रूप में शामिल किया जाए। – IIT कानपुर या IIT रुड़की जैसे प्रतिष्ठित संस्थान के सहयोग से भीड़ विज्ञान और शहरी जोखिम प्रबंधन का एक “सेंटर ऑफ एक्सीलेंस” स्थापित हो। – दिल्ली अर्बन आर्ट कमीशन की तर्ज पर उत्तर प्रदेश के लिए एक सांविधिक आयोग बनाने की संभावना तलाशी जाए। – हर बड़े सार्वजनिक आयोजन में प्रमाणित भीड़-सुरक्षा विशेषज्ञों की सहभागिता अनिवार्य की जाए। प्राधिकरण और उत्तर प्रदेश ब्रज तीर्थ विकास परिषद जैसी संस्थाएं मास्टर प्लानिंग और भवन उपनियमों में भीड़ विज्ञान को शामिल करें। गुण-दोष के आधार पर कोर्ट ने याचिकाकर्ता को राहत देते हुए कहा कि प्राधिकरण के समक्ष नए सिरे से अपनी बात रख सकता है, और प्राधिकरण सुप्रीम कोर्ट के 13 नवंबर 2024 के आदेश के अनुपालन में जारी सरकारी परिपत्रों के आलोक में निर्णय लेगा। तब तक कमिश्नर, आगरा मंडल का 4 सितंबर 2025 का आदेश स्थगित रहेगा। कोर्ट ने अपने आदेश की प्रति मुख्य सचिव, उच्च शिक्षा सचिव, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष और केंद्रीय उच्च शिक्षा सचिव को भी भेजने का निर्देश दिया है, ताकि इन सिफारिशों पर आगे कार्रवाई हो सके।

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