Strategy to Drop MLAs to Beat Anti-Incumbency in Elections

यूपी विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा की ओर से कराए गए आंतरिक सर्वे में पार्टी को बड़ा झटका लगा है। रिपोर्ट बताती है कि मौजूदा हालात में अगर चुनाव हुए, तो भाजपा को बहुमत के लिए संघर्ष करना पड़ सकता है।

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सीधे तौर पर 52 से 67 सीटों का नुकसान हो सकता है। भाजपा को 190 से 205 सीटें मिल रही हैं। बहुमत के लिए 202 सीटें चाहिएं। 2022 चुनाव में भाजपा को 255 सीटें मिली थीं। उपचुनाव में भाजपा के खाते में 2 और सीटें जुड़ गई थीं। अभी भाजपा के कुल 257 विधायक हैं।

एजेंसी ने इस नुकसान से बचने के लिए सुझाव भी दिए हैं। इसके लिए पार्टी को अपने मौजूदा 35% विधायकों के टिकट काटने होंगे। पूर्वांचल में विधायकों को लेकर सबसे ज्यादा नाराजगी है।

भाजपा ने विधानसभा चुनाव से पहले नेशन विद नमो एजेंसी से सर्वे कराया। यह एक रजिस्टर्ड संस्था है। भाजपा के लिए पॉलिटिकल सर्वे कराती है। इसमें विशेषज्ञों और टीम में शामिल रिसर्चर्स ने मार्च से जुलाई के दूसरे सप्ताह के तक सभी विधानसभा क्षेत्रों में पहुंचकर निर्धारित सैंपल लिए। लोगों से कुछ सवाल पूछे-

  • क्या आप मौजूदा विधायक से खुश हैं? उनकी छवि कैसी है?
  • आपके कौन-से स्थानीय मुद्दे ऐसे हैं, जिनकी सुनवाई नहीं हो सकी?
  • सीट का जातिगत समीकरण क्या है? किस जाति के कैंडिडेट को आप चाहते हैं?
  • भाजपा और विपक्ष के संभावित उम्मीदवारों पर राय ली गई।

सर्वे में 2 तरह की नाराजगी नजर आई

सर्वे रिपोर्ट में लोगों की नाराजगी को 2 तरह से बांटा गया है। पहली कैटेगरी में सरकार यानी केंद्र और राज्य सरकार की नीतियों से नाराजगी को रखा गया है। दूसरी कैटेगरी में विधायकों के लिए गुस्से को रखा गया।

सर्वे के दौरान जनता ने सरकार से जुड़ी जिन नीतियों और घटनाओं पर असंतोष जताया, वो इस तरह हैं-

  • UGC के नए नियम- लोगों के बीच सबसे ज्यादा चर्चा यूजीसी के नए नियमों की रही। इनमें दलित, पिछड़े और अन्य वंचित वर्ग के छात्रों ने माना कि उनकी शिकायतों को सुनने के लिए जो समिति बनाने का प्रावधान था, उसको रोकना गलत था। सामान्य वर्ग का कहना था कि इससे हमारे बच्चे कॉलेज में असुरक्षित माहौल में पढ़ेंगे।
  • राम मंदिर चढ़ावा चोरी- राम मंदिर में चढ़ावा चोरी की घटना के बाद अवध और पूर्वांचल में भाजपा के समर्थकों में ही नाराजगी सामने आई। सीधे तौर पर लोग भाजपा को जिम्मेदार नहीं मान रहे, लेकिन उनका कहना है कि इसको रोका जा सकता था।
  • थाना-तहसील में सुनवाई- आम लोगों और भाजपा कार्यकर्ताओं की शिकायतें समय पर नहीं सुने जाने की बात भी सामने आई। लोगों का कहना था कि सरकारी योजनाओं का पूरा फायदा अभी भी आखिरी व्यक्ति तक नहीं पहुंच पा रहा।
  • NEET पेपर लीक- लोगों का कहना है कि भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ियां नहीं रुक रहीं। ज्यादातर परिवारों ने माना कि पेपर लीक रोकना सरकार की जिम्मेदारी है। किसी आयोग पर पूरा ठीकरा नहीं फोड़ा जा सकता।
  • E-20 एथेनॉल- पेट्रोल में 10% से बढ़ाकर 20% एथेनॉल मिलाने के फैसले पर भी लोगों ने सवाल उठाए। कई लोगों ने इसके लिए केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी को ही माइलेज कम होने और वाहन के इंजन खराब होने के लिए जिम्मेदार बताया।

विधायकों से नाराजगी इन वजहों से सामने आई-

  • कई विधायक अपने क्षेत्र में सक्रिय नहीं हैं।
  • क्षेत्र के विकास कार्य नहीं कराए।
  • ठेका, पट्टा और खनन से जैसे मामलों से जुड़े होने से छवि खराब हो गई।

सर्वे रिपोर्ट में टीम ने 2 तरह के सुझाव दिए

सुझाव 1- 30 से 35% विधायकों के टिकट काटने चाहिए सर्वे में भाजपा के 30% से 35% विधायकों के खिलाफ नाराजगी सामने आई। लोगों ने सर्वे करने पहुंची टीम से साफ कहा कि अगर लोकसभा की तरह विधानसभा चुनाव में भी पुराने चेहरों को दोबारा मौका दिया गया, तो हम दूसरे विकल्प तलाशेंगे।

सर्वे में सुझाव दिया गया है कि इन नतीजों को पलटने के लिए भाजपा को अपने मौजूदा 257 विधायकों में 30 से 35% के टिकट काटने होंगे। इससे लोगों की सत्ता पक्ष के विधायकों के लिए नाराजगी कम होगी। भाजपा बहुमत के आंकड़े को पार कर सकती है।

फिलहाल पार्टी 190 से 205 सीटों पर मजबूत है। लेकिन, उम्मीदवार के सही चयन, जातीय समीकरण साधने और चुनाव से ठीक पहले बनने वाले मुद्दों के आधार पर इस अनुमान में 10% का उतार-चढ़ाव हो सकता है।

2022 में भी बदले गए थे चेहरे

2022 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा ने 2 एजेंसियों से सर्वे कराया था। उसी रिपोर्ट के आधार पर भाजपा ने 120 से ज्यादा विधायकों के टिकट काट दिए थे। 403 में से 165 सीटों पर नए उम्मीदवार उतारे थे। इसके बावजूद भाजपा की सीटें 2017 के मुकाबले 312 से घटकर 255 रह गई थीं। इससे भाजपा को 57 सीटों का नुकसान हुआ था।

सुझाव 2- राष्ट्रवाद जैसे मुद्दों पर चुनाव लड़ने में फायदा

सर्वे टीम का मानना है कि अगर चुनाव धर्म, राष्ट्रवाद और कानून व्यवस्था जैसे मुद्दों पर केंद्रित रहा, तो भाजपा को फायदा होगा। लेकिन, अगर सपा 2024 लोकसभा चुनाव की तरह जातीय समीकरण और PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) की राजनीति को बड़ा मुद्दा बनाने में सफल रही, तो भाजपा को नुकसान हो सकता है।

नई पीढ़ी में यादवों के लिए नाराजगी कम हुई

सर्वे टीम में शामिल एक सदस्य ने बताया कि यादवों को सपा का पारंपरिक वोटर माना जाता रहा है। सपा शासन में कई मामलों में यादवों की सुनवाई जल्दी हो जाती थी। ऐसे में गैर-यादव लोगों में उनके लिए नाराजगी देखी जाती थी। लेकिन, पिछले 5 साल में यह नाराजगी कम हुई है। खासकर जेन-जी (नई पीढ़ी) यादव बनाम गैर-यादव वाले कॉन्सेप्ट को सही नहीं मान रही।

योगी की टीम भी करा रही अलग सर्वे

भाजपा संगठन का सर्वे पूरा हो चुका है। लेकिन, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एक अलग चुनावी सर्वे करवा रहे हैं। निजी एजेंसी गांव-गांव जाकर लोगों से सरकार, विधायकों और मुख्यमंत्री की छवि पर फीडबैक जुटा रही है।

2022 के चुनाव के बाद विधायकों के निष्कासन, उपचुनाव और मृत्यु के बाद ये स्थिति बनी है।

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