दतिया उपचुनाव में 71.44% मतदान हुआ। सबसे बड़ा बदलाव महिला वोटिंग में दिखा। 2023 में महिलाएं पुरुषों से 1.94 प्रतिशत आगे थीं, लेकिन इस बार 5.61 प्रतिशत अंक पीछे रहीं। 2008 से अब तक हुए पांच चुनावों में यह सबसे बड़ा जेंडर गैप है।
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इस बार कुल मतदान भी 2008 के 73.59% के करीब रहा। तब दतिया में 1.37 लाख वोटर थे, अब करीब 2.20 लाख हैं। वोटर 60% बढ़े, लेकिन मतदान प्रतिशत 18 साल पुराने स्तर के आसपास रहा।
इस वोटिंग पैटर्न से किसका चुनावी गणित बन या बिगड़ सकता है? भास्कर ने एक्सपर्ट से समझा। पढ़िए, रिपोर्ट…

2026 में पुरुष-महिला मतदान का अंतर सबसे ज्यादा
दतिया में 2008 से 2026 के पांच चुनावों में 2023 इकलौता चुनाव था, जब महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों से ज्यादा रहा। तब 81.22% महिलाओं और 79.28% पुरुषों ने वोट डाला था। यानी महिला मतदान 1.94 प्रतिशत अंक ज्यादा था।
2026 में तस्वीर पलट गई। पुरुषों का मतदान 74.09% रहा, जबकि महिलाओं का 68.48%। यानी पुरुषों का मतदान महिलाओं से 5.61 प्रतिशत अंक ज्यादा रहा। पांच चुनावों में यह पुरुष-महिला मतदान का सबसे बड़ा अंतर है।
2023 से तुलना करें तो पुरुषों और महिलाओं, दोनों का मतदान घटा है। महिला मतदान में 12.74 प्रतिशत अंक की गिरावट आई। पुरुष मतदान में 5.19 प्रतिशत अंक की कमी आई।

2008 के करीब पहुंचा मतदान, तब 73.59% वोटिंग हुई थी
इस उपचुनाव में शाम 6 बजे तक 71.44% मतदान हुआ। यह 2008 के विधानसभा चुनाव के 73.59% मतदान के करीब है। अंतर करीब 2.15 प्रतिशत अंक का है। यह तुलना इसलिए भी अहम है क्योंकि 18 साल में दतिया के वोटर्स की संख्या में बड़ा इजाफा हुआ है।
2008 में करीब 1.37 लाख मतदाता थे, जबकि 2026 में यह संख्या करीब 2.20 लाख हो गई है। यानी मतदाता करीब 60% बढ़े, लेकिन मतदान प्रतिशत 2008 से भी कम रहा। 2008 में भी महिलाओं का मतदान पुरुषों की तुलना में कम था। उस चुनाव में शहरी क्षेत्रों में मतदान प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों के मुकाबले कम रहा था।

दिव्यांग और बुजुर्गों ने परिचित और सुरक्षाकर्मियों की मदद से वोट डाला।
2008 में चार बड़े चेहरों के बीच था मुकाबला
2008 के विधानसभा चुनाव में कुल 18 उम्मीदवार मैदान में थे, लेकिन मुख्य मुकाबला बीजेपी, कांग्रेस, बसपा और भारतीय जनशक्ति पार्टी के बीच था। बीजेपी से नरोत्तम मिश्रा, कांग्रेस से घनश्याम सिंह, बसपा से राजेंद्र भारती और भारतीय जनशक्ति पार्टी से अवधेश नायक उम्मीदवार थे।
नरोत्तम मिश्रा ने बसपा के राजेंद्र भारती को 11,233 वोटों से हराया था। कांग्रेस के घनश्याम सिंह तीसरे स्थान पर रहे थे। करीब 18 साल बाद हुए उपचुनाव में भी इन नेताओं से जुड़े राजनीतिक समीकरण चर्चा में रहे। फर्क यह है कि इस बार बीजेपी से नरोत्तम मिश्रा खुद उम्मीदवार नहीं हैं।
पार्टी ने आशुतोष तिवारी को टिकट दिया है, जबकि कांग्रेस ने एक बार फिर घनश्याम सिंह को मैदान में उतारा है।

एक्सपर्ट बोले- 2008 की तरह वोटर्स में उत्साह कम दिखा
वरिष्ठ पत्रकार रवि ठाकुर के मुताबिक, 71.44% मतदान वोटर्स में अपेक्षाकृत कम उत्साह की ओर इशारा करता है। 2008 में भी 73.59% मतदान हुआ था। 2026 का मतदान प्रतिशत 2008 से अब तक हुए पांच चुनावों में सबसे कम है। ठाकुर कहते हैं कि इस बार पुरुषों ने महिलाओं की तुलना में ज्यादा मतदान किया।
उनके मुताबिक, 2023 में लाड़ली बहना जैसी योजना महिला मतदाताओं को प्रभावित करने वाला एक बड़ा फैक्टर हो सकती थी। इस उपचुनाव में महिलाओं को केंद्र में रखकर दोनों प्रमुख दलों की ओर से ऐसी कोई नई चुनावी पेशकश नहीं थी। यह महिला मतदान में आई गिरावट का एक कारण हो सकता है।

मतदान केंद्रों पर सुबह 7 बजे ही वोटर पहुंच गए थे।
राजनीतिक समीकरण भी 2008 जैसे, तब तीसरे दलों ने बदला था गणित
रवि ठाकुर के मुताबिक, इस उपचुनाव के राजनीतिक हालात भी काफी हद तक 2008 जैसे दिखाई दिए। तब भारतीय जनशक्ति पार्टी से चुनाव लड़े अवधेश नायक ने बीजेपी के वोट बैंक में सेंध लगाई थी, जबकि बसपा के राजेंद्र भारती ने कांग्रेस के वोटों को प्रभावित किया था। इसका फायदा बीजेपी को मिला और नरोत्तम मिश्रा चुनाव जीत गए।
इस बार भी दोनों प्रमुख दलों के भीतर असंतोष की स्थिति दिखाई दी। ठाकुर का दावा है कि नरोत्तम मिश्रा को टिकट नहीं मिलने से उनके समर्थकों के एक हिस्से में नाराजगी थी। मतदान के दौरान इनमें से कुछ समर्थक कांग्रेस की मदद करते दिखाई दिए। दूसरी ओर, राजेंद्र भारती के कुछ समर्थकों का रुझान बीजेपी की ओर दिखाई दिया।

जिगना में कांग्रेस ने बीजेपी पर फर्जी वोटिंग का आरोप लगाया तो कार्यकर्ताओं में कहासुनी हुई।
आजाद समाज पार्टी कितने वोट लेती है, इस पर भी नजर
ठाकुर के मुताबिक, आजाद समाज पार्टी के दामोदर यादव बीजेपी और कांग्रेस दोनों के चुनावी समीकरण प्रभावित कर सकते हैं। मतदान के दौरान यादव मतदाताओं के एक हिस्से का समर्थन दामोदर यादव की ओर दिखाई दिया। वहीं, एससी वर्ग के कुछ युवा मतदाताओं में भीम आर्मी की ओर रुझान नजर आया।
कुछ इलाकों में कांग्रेस और आजाद समाज पार्टी के बीच सीधा मुकाबला भी दिखाई दिया। पाल-बघेल और कुशवाहा समाज को बीजेपी का पारंपरिक वोट बैंक माना जाता है, लेकिन ठाकुर के मुताबिक इन वर्गों के कुछ मतदाता भी आजाद समाज पार्टी के खेमे में जाते दिखाई दिए।
ठाकुर का आकलन है कि अगर दामोदर यादव 10 हजार वोटों का आंकड़ा पार करते हैं तो वे बीजेपी और कांग्रेस दोनों के चुनावी समीकरण प्रभावित करने की स्थिति में होंगे। ऐसे में यह भी अहम होगा कि उनके खाते में आने वाले वोटों का बड़ा हिस्सा किस पार्टी के परंपरागत वोट बैंक से निकला है।

कम मतदान किसके लिए फायदेमंद, अभी तस्वीर साफ नहीं
कम मतदान का फायदा बीजेपी को मिलेगा या कांग्रेस को, इसे लेकर तस्वीर अभी साफ नहीं है। रवि ठाकुर का मानना है कि इसका फैसला काफी हद तक दोनों दलों के अंदरूनी समीकरण और वोट ट्रांसफर तय करेंगे।
अगर नरोत्तम मिश्रा को टिकट नहीं मिलने से नाराज उनके समर्थकों का एक हिस्सा मतदाताओं को कांग्रेस के पक्ष में करने में सफल रहा है तो इसका फायदा घनश्याम सिंह को मिल सकता है। वहीं, अगर बीजेपी ने नरोत्तम मिश्रा फैक्टर को मैनेज कर अपने पारंपरिक वोट को पार्टी के साथ बनाए रखा है तो इसका फायदा आशुतोष तिवारी को मिल सकता है।

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