कानपुर-जू में जानवरों की बोरियत दूर करने का अनोखा तरीका:शेर खेल रहे लकड़ी की बॉल से, भालू को मिल रहा शहद वाला ड्रम


चिड़ियाघर में पिंजरों और बाड़ों में रहने वाले जानवरों को जंगल जैसा माहौल देने के लिए कानपुर ज़ू ने खास पहल शुरू की है। यहां ‘इनरिचमेंट’ (संवर्धन) प्रक्रिया के तहत बाड़ों में ऐसे बदलाव किए जा रहे हैं, जिससे जानवर मानसिक रूप से सक्रिय रहें और उनका प्राकृतिक व्यवहार भी बना रहे। इसका फायदा ज़ू में मौजूद 105 प्रजातियों के करीब 1,309 वन्यजीवों को मिल रहा है। ज़ू के वरिष्ठ वन्यजीव चिकित्सक डॉ. नासिर ने बताया कि जंगल में जानवर शिकार करने, पेड़ों पर पंजे रगड़ने और भोजन तलाशने जैसे कामों में व्यस्त रहते हैं। लेकिन बाड़ों में रहने से उनका यह स्वाभाविक व्यवहार कम होने लगता है। इसी वजह से हर प्रजाति की जरूरत और आदत के मुताबिक उनके बाड़ों में बदलाव किए जा रहे हैं। भालू के लिए शहद से भरे ड्रम और नकली दीमक के टीले भालुओं के बाड़ों में नकली दीमक के टीले बनाए गए हैं। सूखी लकड़ियों के नीचे बनने वाली दीमक को भालू चाव से खाते हैं। वहीं छेद वाले ड्रमों में शहद और भुने चने भरकर लटकाए गए हैं। इन्हें निकालने के लिए भालू ड्रम को घुमाते हैं, जिससे उनका दिमाग और शरीर दोनों सक्रिय रहते हैं। पक्षियों को पेड़ से फल तोड़ने जैसा अहसास पक्षियों के बाड़ों में सीढ़ियां और खिलौने लगाए गए हैं। उन्हें थाली में खाना देने की बजाय फलों को तारों और टहनियों में फंसाकर रखा जाता है, ताकि उन्हें पेड़ों से फल तोड़कर खाने जैसा प्राकृतिक अनुभव मिले। शेर-बाघ खेल रहे लकड़ी की बॉल, नाखून भी कर रहे तेज ज़ू में शेर और बाघ जैसे बड़े मांसाहारी जानवरों के बाड़ों में लकड़ी की बड़ी-बड़ी बॉल और लट्ठे रखे गए हैं। ये जानवर इन्हें फुटबॉल की तरह इधर-उधर लुढ़काते हैं और लट्ठों पर पंजे रगड़कर अपने नाखून भी तेज करते हैं। इसके अलावा बाड़ों में ऊंचे मचान बनाए गए हैं, जहां वे बैठकर आराम कर सकें। सांप, कंगारू और गैंडे के लिए भी खास इंतजाम सांप घर में सूखी और उलझी हुई टहनियां रखी गई हैं, ताकि सांप आसानी से उन पर रगड़कर अपनी केंचुल उतार सकें। वहीं कंगारू, गैंडा और ज़ेब्रा के बाड़ों में मड बाथ (कीचड़ स्नान) के गड्ढे और वॉटर स्प्रिंकलर लगाए गए हैं, जिससे वे गर्मी से राहत पाने के साथ स्वाभाविक व्यवहार भी कर सकें। कम खर्च में जंगल जैसा माहौल डॉ. नासिर ने बताया कि इस पूरी व्यवस्था के लिए महंगे उपकरणों की जरूरत नहीं पड़ती। ज़ू में उपलब्ध बांस और लकड़ियों में छेद कर उनमें फल, सब्जियां और शहद भर दिया जाता है। इन्हें पाने के लिए जानवरों को मेहनत करनी पड़ती है, जिससे उनका दिमाग और शरीर दोनों सक्रिय रहते हैं। इस पहल का उद्देश्य यही है कि बाड़ों में रहने के बावजूद जानवर खुद को कैद में नहीं, बल्कि जंगल जैसे माहौल में महसूस करें।

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