'ढेड़िया' लोकनृत्य नहीं, नारी शक्ति-आस्था का प्रतीक:प्रयागराज में 'ढेड़िया' लोक परंपरा पर विमर्श, संरक्षण पर जोर


प्रयागराज में उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र द्वारा आयोजित ‘विमर्श’ संवाद श्रृंखला में वरिष्ठ नृत्यांगना बीना सिंह ने उत्तर भारत की पारंपरिक लोककला ‘ढेड़िया’ पर विस्तृत चर्चा की। उन्होंने बताया कि यह लोकनृत्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, नारी शक्ति, धैर्य और समर्पण का प्रतीक है। कार्यक्रम का शुभारंभ उपनिदेशक डॉ. मुकेश उपाध्याय, कार्यक्रम प्रभारी कृष्ण मोहन द्विवेदी और मुख्य वक्ता बीना सिंह ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया। बीना सिंह ने अपने व्याख्यान में ‘ढेड़िया’ के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि लोक मान्यताओं के अनुसार, त्रेता युग में भगवान श्रीराम के वनवास गमन के समय उनकी मंगल यात्रा और सकुशल वापसी की कामना के लिए ‘ढेड़िया उतारने’ की परंपरा प्रारंभ हुई थी। यह परंपरा समय के साथ लोक संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई। उन्होंने ‘ढेड़िया’ शब्द का अर्थ ‘धैर्यवान बहू’ बताया। यह परंपरा महिलाओं के धैर्य, त्याग, श्रद्धा और परिवार के प्रति उनके समर्पण का प्रतीक है। इस लोककला की एक विशिष्ट विशेषता यह है कि महिलाएं अपने सिर पर जलता हुआ दीपक रखकर संतुलन के साथ नृत्य करती हैं, जो आत्मसंयम और गहरी आस्था को दर्शाता है। बीना सिंह ने अनुष्ठान की विधि भी समझाई। उन्होंने बताया कि पूर्व में इस परंपरा में मिट्टी के पात्र में धान की भूसी और कड़वा तेल डालकर दीपक जलाया जाता था। महिलाएं इस दीपक को लेकर गांव के देवस्थल तक जाती थीं और परिवार की सुख-समृद्धि, अच्छी फसल तथा समाज के कल्याण के लिए प्रार्थना करती थीं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि वर्तमान समय में ऐसी लोक परंपराओं का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र लोककलाओं के संरक्षण और उन्हें नई पीढ़ी तक पहुंचाने में सराहनीय भूमिका निभा रहा है। कार्यक्रम के अंत में एक प्रश्नोत्तर सत्र भी आयोजित किया गया, जिसमें प्रतिभागियों ने लोक संस्कृति और ‘ढेड़िया’ परंपरा से संबंधित प्रश्न पूछे। कार्यक्रम का संचालन आकाश अग्रवाल ने किया।

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