सांसद चंद्रशेखर ने राज्यपाल को लिखा पत्र:KGMU के अगले कुलपति पद पर SC, ST या OBC वर्ग से नियुक्ति हो, कभी इस वर्ग का नहीं हुआ


आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं नगीना से सांसद चंद्रशेखर ने किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) के अगले कुलपति के चयन में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) या अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के योग्य शिक्षाविद् को अवसर देने की मांग उठाई है। उन्होंने राज्यपाल एवं कुलाधिपति को पत्र भेजकर कहा है कि यह निर्णय संविधान की भावना, सामाजिक न्याय और समावेशी प्रशासन के अनुरूप होगा। संविधान के प्रावधानों का दिया हवाला चंद्रशेखर ने अपने पत्र में संविधान के अनुच्छेद 14, 15(4), 16(4), 16(4क) और अनुच्छेद 46 का उल्लेख करते हुए कहा कि ये प्रावधान अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और सामाजिक व शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के हितों की रक्षा तथा उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने का निर्देश देते हैं। ऐसे में विश्वविद्यालय जैसे महत्वपूर्ण सार्वजनिक संस्थानों के शीर्ष नेतृत्व का चयन भी इसी भावना के अनुरूप होना चाहिए।
चन्द्र शेखर का पत्र KGMU के इतिहास में प्रतिनिधित्व का मुद्दा उठाया पत्र में उन्होंने कहा कि यह अत्यंत खेद का विषय है कि KGMU के सौ वर्ष से अधिक लंबे इतिहास में आज तक किसी अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के योग्य शिक्षाविद् को कुलपति बनने का अवसर नहीं मिला। उनके अनुसार यह केवल प्रतिनिधित्व का प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, समान अवसर और लोकतांत्रिक भागीदारी का भी विषय है।
आरक्षित पदों पर नियुक्तियों को लेकर भी सवाल सांसद ने दावा किया कि वर्तमान कुलपति के कार्यकाल में आरक्षित वर्ग के 108 शिक्षकीय पदों के सापेक्ष केवल 30 नियुक्तियां की गईं, जबकि 78 पदों को “Not Found Suitable” बताते हुए रिक्त छोड़ दिया गया। साथ ही कार्य परिषद द्वारा स्वीकृत लगभग 100 बैकलॉग पदों का विज्ञापन भी अब तक जारी नहीं किया गया।
योग्य SC, ST या OBC शिक्षाविद् को अवसर देने की अपील चंद्रशेखर ने राज्यपाल से अनुरोध किया कि KGMU के अगले कुलपति के चयन में सामाजिक न्याय, संवैधानिक मूल्यों और समावेशी प्रशासन को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए। उन्होंने कहा कि SC, ST या OBC वर्ग के किसी योग्य, अनुभवी और उत्कृष्ट शिक्षाविद् को यह दायित्व सौंपने का निर्णय ऐतिहासिक साबित होगा।
‘ऐतिहासिक फैसला विश्वविद्यालय को नई दिशा देगा’ पत्र के अंत में सांसद ने कहा कि ऐसा निर्णय न केवल संविधान की भावना के अनुरूप होगा, बल्कि विश्वविद्यालय में सामाजिक प्रतिनिधित्व, पारदर्शिता और न्यायपूर्ण प्रशासन को भी नई दिशा देगा। उन्होंने इसे सामाजिक न्याय की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम बताया।

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