रायपुर एयरपोर्ट की जमीन पर दावा, किसान सुप्रीम कोर्ट पहुंचा:बोला- 1942 में अंग्रेजों ने जमीन युद्ध के लिए ली थी, 3500 करोड़ मुआवजा दें


रायपुर के 53 वर्षीय किसान अश्विनी बांधे का दावा है कि जिस जमीन पर आज स्वामी विवेकानंद इंटरनेशनल एयरपोर्ट की टर्मिनल बिल्डिंग और गार्डन बने हैं, वह उनकी है। बांधे के मुताबिक यह जमीन द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार ने अस्थायी तौर पर ली थी। उनका कहना है कि युद्ध खत्म होने के बाद यह जमीन लौटाई जानी थी। इसी दावे के आधार पर वे 35 साल से कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। साल 2026 में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने दोबारा जांच करने के आदेश दिए। वहीं किसान का कहना है कि सक्षम अधिकारी पहले ही जांच कर चुके हैं। इस आधार पर जून 2026 में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई और करीब 3500 करोड़ के मुआवजे की मांग की है। सुप्रीम कोर्ट ने अभी इस दावे को सही या गलत नहीं माना है। मामला विचाराधीन है। पहले देखिए ये तस्वीरें- 35 साल…और फाइलें ही बन गईं जिंदगी अश्विनी बांधे के लिए सरकारी फाइलें ही उनकी जिंदगी बन चुकी हैं। पिछले 35 साल से वे रिकॉर्ड रूम, दफ्तरों, लाइब्रेरी और कोर्ट के चक्कर काटकर एक-एक दस्तावेज जोड़ रहे हैं। 1990 के दशक में जब उन्होंने जमीन के रिकॉर्ड तलाशना शुरू किया, तब उन्हें अंदाजा नहीं था कि यह उनकी जिंदगी का सबसे लंबा सफर बन जाएगा। आज उनके पास ऐसे अहम दस्तावेज हैं जो गूगल पर भी नहीं मिलेंगे। 3 दशक से ज्यादा समय बीतने के बाद भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी है। अब उनकी पूरी उम्मीद सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिकी है। उनका कहना है कि इस मामले की पैरवी में अब तक उनके 15 से 20 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। इसमें अदालतों के चक्कर, वकीलों की फीस, देश भर से पुराने रिकॉर्ड जुटाने और लगातार यात्रा का खर्च शामिल हैं। कहानी की शुरुआत 1942 से होती है द्वितीय विश्व युद्ध और ब्रिटिश काल का कनेक्शन: इस कहानी का पहला चैप्टर साल 1942 में शुरू होता है, जब दुनिया द्वितीय विश्व युद्ध की आग में जल रही थी और भारत पर अंग्रेजों का राज था। युद्ध के दौरान अपनी सैन्य जरूरतों को पूरा करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने ‘डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट’ लागू किया। इसके तहत देशभर में एयरफील्ड और सैन्य ठिकाने बनाने के लिए करीब 17.5 लाख हेक्टेयर जमीन अधिग्रहित की गई थी। उसी दौर में छिनी बांधे परिवार की जमीन: अंग्रेजों की इसी देशव्यापी भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया का हिस्सा रायपुर का माना एयरपोर्ट इलाका भी बना। इसी दौरान बांधे परिवार के पूर्वजों की माना एयरपोर्ट इलाके में स्थित 30 एकड़ 18 डिसमिल जमीन भी सरकारी कब्जे में चली गई। यही वह शुरुआत थी, जिसने दशकों लंबी कानूनी लड़ाई की बुनियाद रखी। ब्रिटिश कानून से रखी गई विवाद की नींव:इस विवाद की जड़ साल 1939 में शुरू हुए द्वितीय विश्व युद्ध से जुड़ी है। तब ब्रिटिश सरकार ने सैन्य जरूरतों, हवाई पट्टियों और शरणार्थी शिविरों के लिए ‘डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट, 1939’ लागू किया था। इसी सख्त कानून के तहत देशभर में करीब 17.5 लाख हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण किया गया था, जो इस पूरे मामले की मुख्य वजह बनी। जमीन के बदले ₹1300 सालाना किराया अश्विनी बांधे के पास मौजूद दस्तावेजों के मुताबिक, तत्कालीन सेंट्रल प्रोविंसेज एंड बरार क्षेत्र में करीब 15,539.49 एकड़ जमीन 4 एयरफील्ड परियोजनाओं के लिए अधिग्रहित की गई। इनमें माना (रायपुर), चकरभाठा (बिलासपुर), मोहानभाठा एयरस्ट्रिप (जगदलपुर) और बिरसी (तत्कालीन मध्य प्रदेश का भंडारा क्षेत्र, वर्तमान महाराष्ट्र) शामिल थे। माना एयरफील्ड के लिए उनके पूर्वजों की जमीन भी इसी दौरान ली गई थी। उनके पास मौजूद रिकॉर्ड के अनुसार, यह अधिग्रहण स्थायी नहीं था, बल्कि युद्धकालीन जरूरतों के लिए अस्थायी व्यवस्था थी। दस्तावेजों में जमीन के बदले ₹1300 सालाना किराया देने का भी जिक्र है। लेकिन न तो उनके परिवार को कभी यह किराया मिला और न ही युद्ध खत्म होने के बाद जमीन वापस की गई। अब बकाया किराया, ब्याज और अन्य दावों को जोड़ते हुए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में करीब साढ़े 3 हजार करोड़ रुपए का दावा किया है। युद्ध खत्म हुआ तो कानून भी खत्म हो गया अश्निनी बताते हैं कि डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट में यह व्यवस्था थी कि युद्ध समाप्त होने और उसके छह महीने बाद तक ही यह कानून प्रभावी रहेगा। दस्तावेजों के मुताबिक, 20 सितंबर 1946 को यह कानून समाप्त हो गया। इसके एक साल बाद 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ। आजादी के बाद प्रशासनिक कामकाज अचानक प्रभावित न हो, इसलिए केंद्र सरकार ने कंटीन्यूएंस ऑफ पावर्स एक्ट, 1947 लागू किया। इस कानून के जरिए युद्धकालीन कई व्यवस्थाओं को अस्थायी रूप से जारी रखा गया। संविधान बना, फिर आया नया कानून दस्तावेजों का अगला पन्ना पलटते हुए वे शेयर करते हैं कि 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के बाद केंद्र ने ‘रिक्विजिशनिंग एंड एक्विजिशन ऑफ इमूवेबल प्रॉपर्टी एक्ट, 1952’ (RAIP Act) बनाया। इस नए कानून के जरिए ही युद्धकालीन जमीनों का प्रशासनिक प्रबंधन शुरू हुआ। दावों के अनुसार, इन जमीनों का नियंत्रण पहले ‘मिनिस्ट्री ऑफ वर्क्स, हाउसिंग एंड सप्लाई’ के पास रहा। आगे चलकर सेंट्रल पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट (CPWD) ने इनका जिम्मा संभाला और जरूरत के मुताबिक अन्य मंत्रालयों या विभागों को ट्रांसफर किया। संस्कृति विभाग की प्रदर्शनी में मिले जमीन के रिकॉर्ड करीब साल भर पहले रायपुर में संस्कृति विभाग की ओर से पुराने अभिलेखों और ऐतिहासिक दस्तावेजों की प्रदर्शनी लगाई गई थी। इसे देखने पहुंचे अश्विनी बांधे तब चौंक गए, जब उन्हें वहां माना एयरफील्ड से जुड़े कई ऐसे सरकारी रिकॉर्ड दिखाई दिए जिनमें उनके पूर्वजों की जमीन का जिक्र था। प्रदर्शनी में कुछ दस्तावेज उन्हें पहले से मालूम थे, लेकिन कई अहम रिकॉर्ड पहली बार उनके सामने आए थे। इसके बाद उन्होंने तुरंत ‘लोक सेवा गारंटी अधिनियम’ का इस्तेमाल कर संस्कृति विभाग से इन सभी दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतियां (Certified Copies) निकालवाईं। उनका दावा है कि विभाग से मिले ये नए सबूत अब सुप्रीम कोर्ट में चल रही उनकी कानूनी लड़ाई का सबसे मजबूत हिस्सा हैं। दस्तावेजों में कई किसानों के नाम दर्ज हैं संस्कृति विभाग के उपसंचालक डॉ. प्रताप पारेख के मुताबिक कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान माना एयरफील्ड के निर्माण के लिए बरौदा, रामचंडी और आसपास के गांवों की जमीन अधिग्रहित की गई थी। विभाग के अभिलेखों में उस दौर के कई राजस्व और अधिग्रहण संबंधी दस्तावेज आज भी सुरक्षित हैं, जिनमें प्रभावित किसानों व भू-स्वामियों के नाम दर्ज हैं। उन्होंने बताया कि अश्विनी बांधे ने प्रदर्शनी के दौरान इन दस्तावेजों को देखा था और बाद में ‘लोक सेवा गारंटी अधिनियम’ के तहत इनकी कॉपियां मांगी थीं। विभाग ने नियमानुसार उपलब्ध रिकॉर्ड उन्हें सौंप दिए हैं, जिनमें उनके पूर्वजों के नाम भी शामिल हैं। अब फैसला सुप्रीम कोर्ट के हाथ में करीब 35 साल से अश्विनी बांधे के हाथ में एक फाइल है। हर सुनवाई में वह थोड़ी और मोटी हो जाती है। उसमें 1942 का रिकॉर्ड है, रक्षा मंत्रालय के पत्र हैं, राजस्व दस्तावेज हैं और उनके पूर्वजों के नाम भी। अब फैसला सुप्रीम कोर्ट को करना है कि इन फाइलों में दर्ज इतिहास सिर्फ कागज है या फिर उस जमीन पर हक की कानूनी बुनियाद, जहां आज रायपुर का इंटरनेशनल एयरपोर्ट खड़ा है। RAIP (STR) कानून और रेकरिंग रिवाइज्ड कंपनसेशन के नियम: RAIP (STR) कानून और रेकरिंग रिवाइज्ड कंपनसेशन (Recurring Revised Compensation) के नियमों के मुताबिक, सरकार जिस तारीख से जमीन कब्जे में लेती है, उसके 365 दिनों (1 साल) के भीतर भुगतान करना अनिवार्य है। यदि ऐसा नहीं होता है, तो ब्याज की दरें समय के साथ इस तरह बढ़ती हैं: 1 से 3 साल तक: समय पर भुगतान न होने पर 9% सालाना ब्याज। 3 से 5 साल तक: इसके बाद भी राशि न मिलने पर 12% ब्याज। 5 से 15 साल तक: 5 साल बीतने पर 15% ब्याज के साथ संशोधित मुआवजा। 15 साल के बाद: इस अवधि के बाद भी भुगतान लंबित रहने पर 18% चक्रवृद्धि (Compound) ब्याज का नियम लागू होता है। 84 साल का हिसाब: अश्विनी का कहना है कि साल 1942 से लेकर अब तक (करीब 84 साल) का बकाया किराया, उस पर अलग-अलग अवधि का भारी ब्याज और अन्य कानूनी दावों को मिलाकर ही उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में ₹3,500 करोड़ का क्लेम किया है। एयरपोर्ट से आगे भी है विवाद यह मामला सिर्फ एयरपोर्ट परिसर तक सीमित नहीं है। अश्विनी के मुताबिक नवा रायपुर और आसपास की कुछ अन्य जमीनों को लेकर भी इसी तरह के विवाद और रिकॉर्ड मौजूद हैं। उनका कहना है कि इन मामलों से जुड़े दस्तावेज भी उनके पास हैं और अलग-अलग स्तर पर कानूनी प्रक्रिया चल रही है। (इस रिपोर्ट में किसान अश्विनी बांधे के उपलब्ध कराए गए दस्तावेजों, उनके पक्ष और न्यायालय में लंबित मामले से संबंधित दावों का उल्लेख है। मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। संबंधित सरकारी विभागों को भी हमने इमेल भेजा है, उनका पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रकाशित किया जाएगा।) यहां देखें दस्तावेज अन्य दस्तावेज …………………. रायपुर की ये खबर भी पढ़िए… 100 रुपए की रिश्वत, 39 साल केस, सब बिखर गया: केस लड़ते-लड़ते पत्नी चल बसी, बच्चों की पढ़ाई छूटी, अब हाईकोर्ट बोला- जागेश्वर निर्दोष है 83 साल की उम्र में चेहरे पर गहरी झुर्रियां, आंखों में न थमने वाला दर्द और 39 साल तक कोर्ट-कचहरी की थकावट। यही पहचान बन गई है जागेश्वर प्रसाद अवधिया की। रायपुर के इस बुजुर्ग ने अपनी पूरी जिंदगी केवल एक लड़ाई में गुजार दी। 100 रुपए की रिश्वत के झूठे केस में बेगुनाही साबित करने की लड़ाई। पढ़ें पूरी खबर

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