बार-बार बढ़ रहा चश्मे का नंबर? हो सकता है काला-मोतिया:गोरखपुर AIIMS में 111 में आधा मरीजों में मिला ग्लूकोमा, बिना जांच के न बदलें चश्मा


आंखों की रोशनी कम होने पर सिर्फ चश्मे का नंबर बदलवाना कई बार भारी पड़ सकता है। गोरखपुर AIIMS के नेत्र रोग विभाग के रिसर्च में सामने आया है कि बार-बार चश्मे का नंबर बढ़ना ग्लूकोमा (काला मोतिया) जैसी गंभीर बीमारी का संकेत भी हो सकता है। दिसंबर 2023 से जुलाई 2025 के बीच OPD में आए 111 ग्रामीण मरीजों पर किए गए रिसर्च में 50 प्रतिशत से अधिक मरीज प्राइमरी एंगल क्लोजर ग्लूकोमा (पीएसीजी) यानी बीमारी के गंभीर चरण में मिले। यह रिसर्च विभागाध्यक्ष डॉ. अलका त्रिपाठी के नेतृत्व में शोधकर्ता डॉ. रोहित कुमार ने किया। रिसर्च में सामने आया है कि अधिकांश मरीजों ने आंखों की जांच डॉक्टर से कराने के बजाय ऑप्टिकल दुकानों पर केवल चश्मे का नंबर बदलवाया। जैसे-जैसे नजर कमजोर होती गई, वे चश्मे का पावर बढ़ाते रहे, जबकि उनकी आंखों में ग्लूकोमा विकसित हो चुका था। बिना लक्षण के बढ़ती रहती है बीमारी रिसर्च में मिला है कि विशेष रूप से प्राइमरी एंगल क्लोजर ग्लूकोमा शुरुआती अवस्था में बिना किसी स्पष्ट लक्षण के बढ़ता रहता है। मरीज जब तक अस्पताल पहुंचता है, तब तक ऑप्टिक नर्व को पूरी तरीके से नुकसान पहुंचा चुकी होती है, जिससे स्थायी दृष्टि हानि का खतरा बढ़ जाता है। आधे से ज्यादा मरीज गंभीर अवस्था में मिले रिसर्च में मरीजों को प्राइमरी एंगल क्लोजर सस्पेक्ट (पीएसीएस), प्राइमरी एंगल क्लोजर (पीएसी), प्राइमरी एंगल क्लोजर ग्लूकोमा (पीएसीजी) और सामान्य श्रेणियों में बांटा गया। इनमें 50 प्रतिशत से अधिक मरीज सीधे पीएसीजी श्रेणी में मिले। विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में नियमित आंखों की जांच की कमी, जागरूकता का अभाव और सीमित स्वास्थ्य सुविधाएं इसके प्रमुख कारण हैं। महिलाओं को ग्लूकोमा का सबसे अधिक खतरा रिसर्च में शामिल 66.7 प्रतिशत मरीज महिलाएं थीं। रिसर्च में पाया गया कि बढ़ती उम्र के साथ महिलाओं में आंख के लेंस का मोटा होना और आगे की ओर खिसकना एंगल क्लोजर की आशंका बढ़ा देता है। मरीजों की औसत आयु 53 वर्ष रही, जबकि सबसे अधिक मरीज 40 से 60 वर्ष आयु वर्ग के थे। इससे स्पष्ट होता है कि ग्लूकोमा अब केवल बुजुर्गों की बीमारी नहीं रह गया है। सिर्फ चश्मे के नंबर बढ़ाने से नहीं चलता पता अध्ययन ने उस पारंपरिक धारणा को भी चुनौती दी है कि दूर का नंबर (हाइपरमेट्रोपिया) वालों में ही ग्लूकोमा का खतरा अधिक होता है। शोध में मायोपिया (नजदीक का नंबर) वाले मरीज भी बीमारी के विभिन्न चरणों में मिले। शोधकर्ताओं के अनुसार, केवल चश्मे के नंबर के आधार पर ग्लूकोमा के जोखिम का आकलन करना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं है। जानिए क्या है ग्लूकोमा (काला मोतिया) ग्लूकोमा आंखों की गंभीर बीमारी है, जिसमें आंख के अंदर का दबाव बढ़ने से ऑप्टिक नर्व को नुकसान पहुंचता है। समय पर इलाज नहीं मिलने पर यह स्थायी अंधेपन का कारण बन सकता है। 40 वर्ष से अधिक आयु, पारिवारिक इतिहास, मधुमेह, उच्च रक्तचाप और आंखों में चोट इसके प्रमुख जोखिम कारक हैं।

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