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बुंदेलखंड के बांदा में लगातार बढ़ रहे तापमान और भीषण गर्मी को लेकर अब वैज्ञानिक स्तर पर अध्ययन शुरू किया गया है। कई बार तापमान 48 डिग्री सेल्सियस से अधिक पहुंचने के बाद जिला प्रशासन ने इस समस्या को गंभीरता से लिया है। जिलाधिकारी अमित आसेरी के अनुरोध पर शासन ने छह सदस्यीय विशेषज्ञ वैज्ञानिकों की टीम बाँदा भेजी है, जो आधुनिक तकनीकों की मदद से तापमान वृद्धि के कारणों का विस्तृत अध्ययन करेगी। वैज्ञानिक टीम रिमोट सेंसिंग तकनीक, उपग्रह चित्रों और पर्यावरणीय आंकड़ों का विश्लेषण कर यह पता लगाएगी कि जिले में गर्मी लगातार क्यों बढ़ रही है। अध्ययन के दौरान भूमि सतह तापमान (लैंड सरफेस टेम्परेचर) का विश्लेषण कर उन क्षेत्रों की पहचान की जाएगी, जहां सबसे अधिक तापमान दर्ज हो रहा है। साथ ही अत्यधिक गर्म क्षेत्रों का वैज्ञानिक मानचित्रण भी किया जाएगा। भूजल स्तर की स्थिति का अध्ययन टीम में हरित आवरण और वन क्षेत्रों की वर्तमान स्थिति का भी मूल्यांकन करेगी। वैज्ञानिक यह जांचेंगे कि वृक्षों की संख्या और वन क्षेत्र में कमी का तापमान वृद्धि से कितना संबंध है। इसके अलावा तालाबों, नदियों, जलाशयों और भूजल स्तर की स्थिति का अध्ययन कर यह समझने का प्रयास किया जाएगा कि नमी की कमी गर्मी को किस हद तक बढ़ा रही है। अध्ययन के दौरान बुंदेलखंड की चट्टानी भूमि, कम आर्द्रता, खुले भूभाग और गर्म हवाओं की दिशा जैसे प्राकृतिक एवं भौगोलिक कारकों का भी विश्लेषण किया जाएगा। वहीं शहरीकरण, कंक्रीट निर्माण, सड़कों के विस्तार, निर्माण गतिविधियों और धूल प्रदूषण से पैदा होने वाले “हीट आइलैंड इफेक्ट” का भी आकलन किया जाएगा। गर्मी से बचाव की दीर्घकालिक रणनीति होगी तैयार जिला प्रशासन का मानना है कि अध्ययन रिपोर्ट से यह स्पष्ट होगा कि बांदा में बढ़ता तापमान केवल मौसमी प्रभाव का परिणाम है या स्थानीय पर्यावरणीय परिस्थितियां भी इसकी बड़ी वजह हैं। रिपोर्ट के आधार पर भविष्य में प्रभावी हीट एक्शन प्लान, व्यापक पौधरोपण अभियान, जल संरक्षण योजनाएं और गर्मी से बचाव की दीर्घकालिक रणनीतियां तैयार की जाएंगी। परियोजना वैज्ञानिक डॉ. हफीजुल्लाह और अभिषेक गोंड जनपद में रहकर अध्ययन कार्य करेंगे। वहीं खनन विभाग सहित संबंधित विभागों को भी वैज्ञानिक टीम को आवश्यक सहयोग उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए हैं।
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बांदा में 48 डिग्री पार तापमान पर वैज्ञानिकों की नजर:गर्मी के कारणों की पड़ताल के लिए 6 विशेषज्ञ पहुंचे, रिमोट सेंसिंग और सैटेलाइट डेटा से होगा अध्ययन