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इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने सीतापुर के नैमिषारण्य स्थित श्री राम-लक्ष्मण-जानकी विराजमान मंदिर ट्रस्ट को निजी ट्रस्ट घोषित किया है। न्यायालय ने मंदिर के प्रबंधन विवाद से संबंधित दायर सभी अपीलों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी मंदिर में आम लोगों के दर्शन-पूजन करने मात्र से उसे सार्वजनिक धार्मिक ट्रस्ट नहीं माना जा सकता। यह फैसला न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार की एकल पीठ ने मूलचंद्र व अन्य की ओर से दाखिल प्रथम अपीलों पर सुनाया। याचियों ने दावा किया था कि मंदिर एक सार्वजनिक धार्मिक ट्रस्ट है, और इसलिए उसके प्रबंधन में हस्तक्षेप करते हुए सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) की धारा 92 के तहत नए सरवहराकार (प्रबंधक) की नियुक्ति की जा सकती है। गुलजारी लाल ने अपने निजी आवासीय परिसर में की थी स्थापना सुनवाई के दौरान, मंदिर ट्रस्ट की ओर से तर्क दिया गया कि मंदिर और ट्रस्ट की स्थापना गुलजारी लाल ने अपने निजी आवासीय परिसर में की थी। ट्रस्ट ने बताया कि इसके संचालन और प्रबंधन की व्यवस्था भी संस्थापक द्वारा निर्धारित नियमों के अनुसार ही चलती रही है। न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि रिकॉर्ड से यह स्पष्ट है कि ट्रस्ट का नियंत्रण और प्रबंधन संस्थापक तथा उनके उत्तराधिकारियों के हाथों में रहा है। इसके अतिरिक्त, ट्रस्ट की संपत्तियां भी मंदिर के रखरखाव और उससे जुड़े उद्देश्यों के लिए ही समर्पित थीं। इन तथ्यों के आधार पर, न्यायालय ने इसे सार्वजनिक ट्रस्ट मानने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने दिया पहले के आदेश का हवाला न्यायालय ने सरवहराकार के पद को लेकर उठाए गए विवाद को भी खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि इस मुद्दे पर पहले ही न्यायिक निर्णय दिया जा चुका है, इसलिए इसे दोबारा उठाने पर ‘रेस ज्यूडीकाटा’ (न्याय निर्णित) का सिद्धांत लागू होगा। फैसले के साथ ही, न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि मंदिर में आम श्रद्धालुओं की आवाजाही या पूजा-अर्चना का अधिकार, ट्रस्ट के निजी स्वरूप को सार्वजनिक ट्रस्ट में नहीं बदल देता है।
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लखनऊ बेंच ने नैमिषारण्य मंदिर ट्रस्ट को घोषित किया निजी:कहा- आम दर्शन से सार्वजनिक दर्जा नहीं मिलेगा; प्रबंधन विवाद में दायर सभी अपीलें खारिज