30 साल पुराने शिक्षक भर्ती विवाद में हाईकोर्ट का फैसला:याचिकाकर्ता साबित नहीं कर सके कि नियुक्तियां विधिक प्रक्रिया के तहत


इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महाराजगंज जिले के धर्मेन्द्र कुमार जनता लघु माध्यमिक विद्यालय में हुई शिक्षक नियुक्तियों से जुड़े लगभग 30 साल पुराने विवाद में सभी याचिकाएं खारिज कर दी हैं। न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की एकल पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर सके कि उनकी नियुक्तियां विधिक प्रक्रिया के तहत और स्वीकृत पदों पर हुई थीं। अदालत ने नियुक्तियों से जुड़े दस्तावेजों में गंभीर विसंगतियां और फर्जीवाड़े के संकेत मिलने की बात कहते हुए राज्य कोष से वेतन और पेंशन देने से इनकार कर दिया। जानिए क्या है पूरा मामला
मामला धर्मेन्द्र कुमार जनता लघु माध्यमिक विद्यालय, सतगुर मुजुरी, महाराजगंज का है। याचिकाकर्ताओं का दावा था कि विद्यालय को 1994 में अनुदान सूची में शामिल किया गया था और 1996 में सहायक अध्यापक तथा लिपिक के पद सृजित किए गए थे। इसके बाद विज्ञापन जारी कर चयन प्रक्रिया पूरी की गई और 27 जून 1996 को नियुक्तियों को बेसिक शिक्षा अधिकारी से मंजूरी भी मिल गई। शिक्षकों ने अदालत को बताया कि वे 1 जुलाई 1996 से लगातार कार्यरत रहे और अगस्त 2000 तक वेतन प्राप्त करते रहे, लेकिन बाद में जांच के नाम पर भुगतान रोक दिया गया। राज्य सरकार ने अपने तर्क दिए
राज्य सरकार ने अदालत में कहा कि जिन पदों पर नियुक्तियां हुईं, उनके सृजन संबंधी आदेश संदिग्ध थे। सरकारी डिस्पैच रजिस्टर में संबंधित आदेशों का कोई रिकॉर्ड नहीं मिला और कुछ दस्तावेज डाकघर को संबोधित पाए गए, जिससे उनकी प्रमाणिकता पर सवाल उठे। सरकार ने यह भी कहा कि नियुक्तियों में नियमों का पालन नहीं हुआ और कुछ अभ्यर्थियों के पास आवश्यक शैक्षिक योग्यता भी नहीं थी। हाईकोर्ट ने कहा कि केवल लंबे समय तक सेवा देने या कुछ वर्षों तक वेतन मिलने से अवैध नियुक्तियां वैध नहीं हो जातीं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि याचिकाकर्ता किसी अवधि में वास्तविक कार्य करने का प्रमाण प्रस्तुत करें, तो वे उस अवधि के वेतन के लिए संबंधित प्राधिकारी के समक्ष दावा कर सकते हैं।

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