गीता से तनाव-अवसाद मुक्ति का संदेश:अखिल भारतीय संस्कृत परिषद् के व्याख्यान में चर्चा


अखिल भारतीय संस्कृत परिषद् ने ‘श्रीमद्भगवद्गीतायाम् अवसादचिकित्सा’ विषय पर एक विशिष्ट व्याख्यान आयोजित किया। इस कार्यक्रम में गीता के माध्यम से तनाव और अवसाद से मुक्ति का संदेश दिया गया।कार्यक्रम में आचार्य ने बताया कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में मनुष्य प्रकृति और संस्कृति से दूर हो रहा है। ऐसे में श्रीमद्भगवद्गीता जीवन को संतुलित करने का मार्ग दिखाती है। मुख्य वक्ता नारी शिक्षा निकेतन महाविद्यालय की पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. पद्मिनी नाटू ने गीता के दूसरे से अठारहवें अध्याय तक के उपदेशों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि मानसिक शांति और सकारात्मक जीवन का सूत्र है।डॉ. नाटू ने बताया कि ज्ञान, कर्म और भक्ति का समन्वय ही गीता की सबसे बड़ी शक्ति है। यह व्यक्ति को निराशा और अवसाद से बाहर निकालने में सहायक है। उन्होंने गीता को भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा का आधार स्तंभ बताया, जिसका संदेश सार्वकालिक और सर्वजन हितकारी है। अपराध भी मानसिक विकार का परिणाम कार्यक्रम के मुख्य अतिथि, कानपुर नगर के सेवानिवृत्त जिला कारागार अधीक्षक, ने अपने संबोधन में कहा कि अपराध भी मानसिक विकार का परिणाम है, जिससे व्यक्ति अवसादग्रस्त हो जाता है। उन्होंने गीता के सिद्धांतों को व्यवहार में उतारकर स्वस्थ और सकारात्मक समाज के निर्माण पर जोर दिया। डॉ. मोहित त्रिवेदी ने आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अवसाद का विश्लेषण किया। उन्होंने बताया कि गीता के द्वितीय, नवम और ग्यारहवें अध्याय मानसिक ऊर्जा बढ़ाने में विशेष भूमिका निभाते हैं। उनके अनुसार, इन अध्यायों का विशिष्ट रागों में पाठ करने से मन में उत्साह और आनंद की अनुभूति होती है। ये मौजूद रहे परिषद् के मंत्री प्रो. प्रयाग नारायण मिश्र ने विषय प्रवर्तन किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता परिषद् के उपाध्यक्ष डॉ. रविकिशोर त्रिवेदी ने की, जबकि संचालन डॉ. अनिल पोरवाल और डॉ. पत्रिका जैन ने किया। इस अवसर पर डॉ. रेखा शुक्ला, डॉ. अभिमन्यु सिंह, डॉ. गौरव सिंह, डॉ. रागिनी श्रीवास्तव, डॉ. सरिता सिंह, डॉ. कुसुम सिंह और डॉ. नीलम पाण्डेय सहित कई आचार्य उपस्थित रहे।

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