देवी दुर्गा पर आपत्तिजनक गीत मामले में जमानत दी:हाईकोर्ट ने कहा-रिकार्ड पर ऐसा कोई साक्ष्य नहीं जिससे साबित हो प्रभाव पड़ा


इलाहाबाद हाईकोर्ट ने देवी दुर्गा पर कथित आपत्तिजनक गीतों के निर्माण में आर्थिक और अन्य सहयोग देने के आरोपी राजवीर सिंह यादव को जमानत दे दी।
कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है, जिससे यह साबित हो कि आरोपी की किसी हरकत से सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित हुई हो। जस्टिस समीर जैन की पीठ ने यह राहत देते हुए कहा कि आरोपी के खिलाफ सह-आरोपी के बयान के अलावा कोई ठोस साक्ष्य मौजूद नहीं है। नवरात्र के दौरान वायरल हुआ था वीडियो मामला पिछले वर्ष नवरात्रि के दौरान वायरल हुए उन गीतों से जुड़ा है, जिनमें माता दुर्गा के खिलाफ कथित अभद्र टिप्पणियां की गई थीं। मिर्जापुर पुलिस ने सितंबर में संयुक्त कार्रवाई करते हुए लोकगायक सरोज सरगम समेत कई लोगों को गिरफ्तार किया। पुलिस की शुरुआती प्रेस विज्ञप्ति में राजवीर सिंह यादव को कथित तौर पर इस पूरे मामले का मास्टरमाइंड बताया गया। आरोप यह भी था कि वह विवादित पुस्तक के संपादक हैं जिससे हिंदू समुदाय की भावनाएं आहत हुईं। इसी आधार पर उनके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया। जमानत याचिका में आरोपी की ओर से कहा गया कि एफआईआर शुरू में केवल सह-आरोपी सरोज सरगम के खिलाफ दर्ज हुई और उनका नाम केवल पुलिस के समक्ष दिए गए सह-आरोपी के बयान में सामने आया। बचाव पक्ष ने दलील दी कि किसी पुस्तक का संपादक होना मात्र यह साबित नहीं करता कि उसने किसी समुदाय की धार्मिक भावनाएं आहत की हैं। आरोपी ने पेश की सफाई आरोपी ने यह भी कहा कि गिरफ्तारी के समय उन्हें गिरफ्तारी के आधार नहीं बताए गए, जो सुप्रीम कोर्ट के विहान कुमार बनाम हरियाणा राज्य मामला में दिए गए निर्देशों का उल्लंघन है। राज्य सरकार ने आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों का समर्थन किया लेकिन यह स्वीकार किया कि सह-आरोपी के बयान और विवादित पुस्तक के संपादक होने के अलावा कोई अन्य साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। राज्य ने यह भी माना कि सार्वजनिक व्यवस्था भंग होने का कोई प्रमाण नहीं है और गिरफ्तारी के आधार आरोपी को नहीं बताए गए। कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि आरोपी को फरार बताते हुए उस पर 25 हजार रुपये का इनाम घोषित किया गया, जबकि एफआईआर दर्ज होने के दो दिन के भीतर ही उसे गिरफ्तार कर लिया गया। अदालत ने कहा कि इससे उसके फरार होने का दावा कमजोर पड़ता है। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि सभी आरोप मजिस्ट्रेट द्वारा सुनवाई योग्य हैं और अधिकांश धाराओं में अधिकतम सजा सात वर्ष तक की है। अदालत ने माना कि आरोपी सात महीने से जेल में है, इसलिए उसे जमानत दी जानी उचित है।

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