सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु से कहा-हिंदी को लेकर सोच बदलें:चेन्नई दिल्ली से अलग-थलग नहीं, वहां हिंदी नहीं पढ़ाई जाएगी ऐसा नहीं हो सकता


सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु में जवाहर नवोदय विद्यालयों की स्थापना के मामले में गुरुवार को राज्य सरकार के रुख पर सवाल उठाए। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने कहा कि राज्य को हिंदी पढ़ाने के मुद्दे पर अपना नजरिया बदलना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि ऐसा नहीं हो सकता कि तमिलनाडु की धरती पर हिंदी नहीं पढ़ाई जाएगी। कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार से केंद्र के साथ बातचीत के जरिए मतभेद सुलझाने को कहा। बेंच ने यह भी कहा कि चेन्नई को दिल्ली से अलग-थलग नहीं करना चाहिए और न ही दिल्ली को चेन्नई से। कोर्ट के मुताबिक, नवोदय स्कूल राज्य की मौजूदा शिक्षा व्यवस्था को कमजोर नहीं करेंगे, बल्कि छात्रों को अतिरिक्त अवसर देंगे। क्या है पूरा मामला? मामला तमिलनाडु के हर जिले में जवाहर नवोदय विद्यालय स्थापित करने से जुड़ा है। मद्रास हाईकोर्ट ने 2017 में राज्य को हर जिले में नवोदय विद्यालय स्थापित करने का निर्देश दिया था। हाईकोर्ट ने माना था कि नवोदय विद्यालय तमिलनाडु के तमिल लर्निंग एक्ट का उल्लंघन नहीं करते और ऐसे स्कूलों से छात्रों को अपनी पसंद की शिक्षा हासिल करने का अवसर मिलेगा। इसके खिलाफ तमिलनाडु सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची। राज्य का कहना है कि शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है, लेकिन राज्य को अपनी शिक्षा नीति बनाने का अधिकार है। तमिलनाडु में दो भाषा नीति लागू है, जबकि नवोदय विद्यालयों की व्यवस्था तीन भाषा फॉर्मूले पर आधारित है। इसी वजह से राज्य ने इन स्कूलों की स्थापना का विरोध किया है। तमिलनाडु की आपत्ति क्या है? राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि तमिलनाडु की दो भाषा नीति तमिल और अंग्रेजी पर आधारित है। इसे 2006 के तमिलनाडु तमिल लर्निंग एक्ट के जरिए कानूनी आधार मिला है। राज्य का कहना है कि नवोदय विद्यालयों की तीन भाषा व्यवस्था को लागू करने के लिए मौजूदा राज्य कानून और नीति से अलग जाना पड़ेगा। राज्य की ओर से पेश वरिष्ठ वकील जयदीप गुप्ता ने कहा कि सरकार हिंदी पढ़ाने के खिलाफ नहीं है, बल्कि नवोदय स्कूलों से जुड़ी भाषा नीति को लेकर आपत्ति है। उन्होंने कहा कि राज्य की नीति के तहत तमिल को महत्व दिया जाना जरूरी है। राज्य ने यह भी तर्क दिया कि नवोदय योजना अनिवार्य नहीं है, इसलिए कोर्ट किसी राज्य को इसे अपनाने का आदेश नहीं दे सकता। तमिलनाडु ने आर्थिक चिंता भी जताई। राज्य की ओर से कहा गया कि केंद्र ने शिक्षा के लिए करीब 5,000 करोड़ रुपए जारी करने का वादा किया था, लेकिन राशि नहीं मिली। ऐसे में राज्य पर अतिरिक्त वित्तीय जिम्मेदारी डालना उचित नहीं होगा। कोर्ट ने हिंदी और भाषा नीति पर क्या कहा? जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि राज्य को अपना नजरिया बदलना होगा। उन्होंने कहा कि तमिलनाडु में हिंदी नहीं पढ़ाई जाएगी, ऐसा नहीं हो सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि नवोदय स्कूल आने से राज्य के शिक्षा स्तर में कमी नहीं आएगी। बेंच ने केंद्र और राज्य के बीच बातचीत पर जोर दिया। कोर्ट ने कहा कि अगर तमिलनाडु तमिल को दूसरी भाषा के तौर पर रखना चाहता है तो इस मुद्दे पर केंद्र के साथ बातचीत की जा सकती है। कोर्ट ने राज्य के शिक्षा सचिव को केंद्र के संबंधित सचिव से बातचीत करने का सुझाव भी दिया। जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि नवोदय स्कूल राज्य की मौजूदा शिक्षा व्यवस्था के अतिरिक्त होंगे। उनके मुताबिक, इससे छात्रों को ज्यादा अवसर मिलेंगे और तमिलनाडु के शिक्षा स्तर पर इसका नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा। केंद्र ने क्या कहा? केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने कहा कि राज्य सरकार को मुख्य रूप से स्कूलों के लिए जमीन उपलब्ध करानी है। स्कूलों के निर्माण और बाकी व्यवस्थाओं का खर्च केंद्र उठाएगा। उन्होंने कहा कि योजना अभी शुरुआती चरण में है और स्कूल बनने में कई साल लग सकते हैं, इसलिए भाषा से जुड़े मतभेदों पर इस दौरान बातचीत की जा सकती है। राज्य ने जवाब दिया कि हर जिले में करीब 30 एकड़ जमीन की जरूरत हो सकती है। राज्य का कहना था कि जब तक यह तय नहीं हो जाता कि वह योजना को स्वीकार करेगा या नहीं, तब तक जमीन की पहचान करना मुश्किल होगा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने जमीन खरीदने के लिए नहीं कहा है, केवल उपयुक्त सरकारी जमीन की पहचान करने को कहा है। दिसंबर 2025 के आदेश पर क्या हुआ? सुप्रीम कोर्ट ने 15 दिसंबर 2025 को तमिलनाडु को हर जिले में नवोदय विद्यालय के लिए जरूरी जमीन की पहचान करने का निर्देश दिया था। राज्य सरकार ने इस आदेश को वापस लेने की मांग की थी। गुरुवार को कोर्ट ने आदेश वापस लेने से इनकार कर दिया। हालांकि, राज्य को इसका पालन करने के लिए तीन महीने का अतिरिक्त समय दिया गया। साथ ही कोर्ट ने केंद्र और तमिलनाडु सरकार के अधिकारियों को नवोदय विद्यालयों की स्थापना और भाषा नीति से जुड़े मुद्दों पर आगे बातचीत करने को कहा है। कोर्ट ने कहा कि अगर बातचीत के बाद भी कोई समस्या रहती है तो राज्य उसे कोर्ट के सामने रख सकता है। मामले की अगली सुनवाई 14 दिसंबर 2026 को होगी।

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