सांवली थी, इसलिए 10 लड़कों ने रिजेक्ट कर दिया:गोरी-पतली लड़की क्यों चाहते हैं लड़के, खूबसूरती क्या है; मुजफ्फरपुर में लड़की ने किया सुसाइड


मुजफ्फरपुर की 22 साल की अंशु ने सिर्फ इसलिए फंदे पर लटककर जान दे दी, क्योंकि वह सांवली थी। लड़के वाले बार-बार देखने के बाद उससे शादी करने से मना कर दे रहे थे। खूबसूरती को काले और गोरे से जोड़कर क्यों देखा जाता है, सुंदरता आखिर है क्या, कैसे बदलते रहते हैं खूबसूरती के पैमाने; जानेंगे बूझे की नाही में… सवाल-1ः मुजफ्फरपुर में लड़की के सुसाइड करने का पूरा मामला क्या है? जवाबः मुजफ्फरपुर के गायघाट थाना क्षेत्र के मकरंदपुर गांव की रहने वाली 22 साल की अंशु कुमारी बीते तीन साल से अंदर ही अंदर परेशान थी। परिवार वाले उसकी शादी के लिए लगातार कोशिशें कर रहे थे। पिछले तीन सालों में 10 से अधिक लड़के वाले अंशु को देखने आए, लेकिन हर बार बात बनते-बनते बिगड़ जाती या रिश्ता तय ही नहीं हो पाता था। परिवार वालों का कहना है कि लगातार टूटते रिश्तों ने अंशु के मन में यह गहरा विश्वास पैदा कर दिया कि उसके सांवले रंग की वजह से उसे बार-बार ठुकराया जा रहा है। समाज के इस नजरिए ने उसके भीतर एक गहरी हीन भावना पैदा कर दी थी, जिसे वह चुपचाप सह रही थी। परिजनों के मुताबिक, 1 जुलाई को एक बार फिर अंशु को देखने के लिए एक नया परिवार आने वाला था। शायद बार-बार रिजेक्ट होने का डर और समाज के सामने फिर से खुद को साबित करने का दबाव उस पर हावी हो चुका था। अंशु मानसिक रूप से इतनी परेशान थी कि उसने 30 जून की रात का खाना भी नहीं खाया और चुपचाप अपने कमरे में सोने चली गई। सुबह यानी 1 जुलाई को काफी देर तक अंशु के कमरे का दरवाजा नहीं खुला तो परिजनों को अनहोनी की आशंका हुई। परिजनों ने खिड़की से झांककर देखा तो अंशु का शव पंखे से लटका मिला। फिलहाल, पुलिस इस संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत के मामले को दर्ज कर गहराई से जांच कर रही है। सवाल-2ः भारत में खूबसूरती को काले और गोरे से जोड़कर क्यों देखा जाता है? जवाब: हिंदू परंपरा में पुरुषों की सुंदरता का प्रतीक भगवान ‘कृष्ण’ को माना जाता है। वो श्याम वर्ण के थे। वाल्मीकि रामायण के मुताबिक, भगवान राम का रंग भी सांवला था और वो बेहद सुंदर माने जाते हैं। मध्यकाल में भारत आए कई यात्रियों ने भी इस बात को लिखा है। 1292 में भारत आए इतालवी व्यापारी मार्को पोलो ने अपनी किताब ‘द ट्रैवल्स’ में लिखा है- ‘यहां सबसे काले इंसान को सबसे ज्यादा सम्मान मिलता है। ये लोग अपने देवताओं और मूर्तियों को काला और शैतानों को बर्फ की तरह सफेद दिखाते हैं।’ 16वीं शताब्दी के बाद मुगल शासन के दौरान भारत के लोगों में गोरे रंग की ओर आकर्षण बढ़ा। मुगल शासक और उनके दरबार में सेंट्रल एशिया और फारसी मूल के लोग थे, जिनकी त्वचा अपेक्षाकृत गोरी थी। उनकी कला, साहित्य और जीवनशैली ने गोरेपन को शाही और अमीर वर्ग से जोड़ा। यह प्रभाव धीरे-धीरे समाज में फैलने लगा। भारत में ब्रिटिश हुकूमत आई तो उसने काले-गोरे में भयंकर विभाजन शुरू कर दिया। क्योंकि सभी अंग्रेज गोरे थे, इसलिए उन्होंने गोरे रंग को बेहतर बताया और काले रंग को गुलामी, अज्ञानता और हीनता से जोड़ दिया। उनकी देखा-देखी भारत के उच्च वर्ग ने भी इस विचार को अपना लिया, क्योंकि वो अंग्रेजी शासकों के करीब रहना चाहते थे। इस दौरान गोरे रंग को लेकर एक मानसिकता बनी, जो आज भी कायम है। आजादी के बाद यह धारणा और मजबूत हुई। खासकर फिल्म उद्योग और विज्ञापनों के जरिए। 1978 में ‘फेयर एंड लवली’ जैसी क्रीम की शुरुआत ने गोरेपन को बड़ा बिजनेस बना दिया। बॉलीवुड ने भी गोरे कलाकारों को खूबसूरत बताया, जिससे आम लोगों में यह चाहत बढ़ी। ‘द इंटरनेशनल जर्नल ऑफ इंडियन साइकोलॉजी’ ने दिल्ली-NCR में 18 से 30 साल के 100 युवाओं पर स्टडी की। इस रिसर्च में पता चला कि लोग अपने रंग के हिसाब से ही सुंदरता की पसंद तय करते हैं। हालांकि, इसमें गोरे रंग की ओर झुकाव ज्यादा दिखा। सवाल-3: सुंदरता आखिर होती क्या है? जवाबः कहा जाता है कि ‘Beauty lies in the eyes of the beholder’ यानी सुंदरता देखने वाले की आंखों में होती है। सुंदरता की कोई एक परिभाषा नहीं है। दुनिया में सुंदरता से जुड़ी अलग-अलग थ्योरीज हैं। इसमें एक थ्योरी रिप्रोडक्शन यानी प्रजनन की बायोलॉजी से जुड़ी है। विकासवादी जीवविज्ञानी मानते हैं कि कोई महिला या पुरुष बच्चे पैदा करने के लिए प्राकृतिक रूप से जितना सक्षम और उपयोगी है, वो उतनी ही आकर्षक और सुंदर लग सकती है। इसी वजह से महिलाओं में सुंदरता के लिए सुडौल स्तन, लंबे बाल, सुराही जैसी गर्दन, चेहरे की सिमेट्री, बड़ा पेल्विक जैसे पैरामीटर इवॉल्व हुए हैं। इसी तरह पुरुषों में लंबा कद, गठीला शरीर, भारी आवाज, घने काले बाल और चेहरे की सिमेट्री जैसे पैमाने इवॉल्व हुए। इस थ्योरी के मुताबिक… सवाल-4: समय के साथ खूबसूरती के पैमाने कैसे बदलते रहते हैं? जवाब: खूबसूरती के कुछ पैमाने और मानक लगातार बदलते रहते हैं। यह बदलाव समाज के सांस्कृतिक, राजनीतिक, आर्थिक और तकनीकी बदलावों के साथ होता रहा है… सवाल-5ः क्या गोरा दिखना ही असल खूबसूरती है। अगर नहीं, तो इस पर बात क्यों नहीं होती? जबावः मगध महिला कॉलेज की एसोसिएट प्रोफेसर निधि सिंह का कहना है, ‘हमें ब्यूटी की परिभाषा को बदल देने की जरूरत है। हमें ब्यूटी यानी खूबसूरती की विविधता को समझना चाहिए। उसको उभारना चाहिए। भारत में खूबसूरती का पैमाना कभी भी किसी का कलर नहीं रहा है। यह वेस्टर्न कल्चर का दिया हुआ है। आज इसको बढ़ावा देने में सबसे बड़ा योगदान ब्यूटी प्रोडक्ट्स का है। वे खूबसूरती के झूठे स्टैंडर्ड सेट करते हैं, ताकि उनका प्रोडक्ट आसानी से बिक सके। इसके अलावा इसे बढ़ाने में सोशल मीडिया का योगदान भी है।’ निधि सिंह का मानना है कि गोरी त्वचा को खूबसूरत समझने की सोच इतनी मजबूत और विकसित हो गई है कि इस पर बात या बहस होती ही नहीं। अगर कोई जन्म से गोरा है तो वो पैदाइशी खूबसूरत है, लेकिन अगर कोई जन्म से काला होता है तो उसे खूबसूरत बोलने की बजाय गोरा करने के नुस्खों पर काम शुरू कर दिया जाता है।

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