![]()
लखनऊ के इंदिरा नगर स्थित जैन मंदिर में चल रहे चातुर्मास के दौरान आचार्य सुबल सागर महाराज ने उपासकों को ‘षट् आवश्यक’ यानी छह दैनिक कर्तव्यों का महत्व समझाया। उन्होंने बताया कि ये कर्तव्य जीवन में धर्म, संयम और आत्मशुद्धि का मार्ग प्रशस्त करते हैं। आचार्य सुबल सागर महाराज ने विस्तार से बताया कि प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन देवदर्शन (प्रभु पूजा), गुरु उपासना (गुरु वंदना), स्वाध्याय, संयम, तप और दान अवश्य करना चाहिए। उन्होंने जोर दिया कि व्यस्तता के बावजूद भी भगवान की पूजा और दान के नियम का पालन करना चाहिए। गुप्त और निस्वार्थ भाव से दान ही वास्तविक पुण्य दान के महत्व पर प्रकाश डालते हुए आचार्य ने कहा कि दान सदैव निस्वार्थ भाव से किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसा दान हो जिसमें एक हाथ से देने पर दूसरे हाथ को भी इसकी खबर न हो। गुप्त और निस्वार्थ भाव से किया गया दान ही वास्तविक पुण्य का कारण बनता है। कार्यक्रम का शुभारंभ भगवान के सहस्र नामों के पाठ से हुआ। इसके उपरांत विश्व शांति की कामना के लिए शांतिधारा का आयोजन किया गया। शांतिधारा करने का सौभाग्य अतिशय जैन, संयम, प्रविज्ञान, धीरज कुमार, अनुरोध, पंकज और रितेश को प्राप्त हुआ। धार्मिक आचरण से जीवन में सकारात्मक सोच विकसित होता हैं शाम को मंदिर में दीपार्चन का आयोजन किया गया, जिसमें अभिषेक जैन, शिप्रा जैन, शशिकला और अपर्णा ने मुख्य भूमिका निभाई। श्रद्धालुओं ने सभी धार्मिक आयोजनों में उत्साहपूर्वक भाग लिया। आचार्य ने अपने संदेश में कहा कि नियमित धार्मिक आचरण से व्यक्ति के जीवन में आत्मअनुशासन, शांति और सकारात्मक सोच विकसित होती है। चातुर्मास के दौरान इन आयोजनों का मुख्य उद्देश्य धर्म के साथ-साथ दैनिक जीवन में अच्छे संस्कारों को अपनाने के लिए प्रेरित करना है।
Source link
लखनऊ में जैन समाज को आचार्य का संदेश:रोज करें देवदर्शन, स्वाध्याय, तप और दान