री-नीट: 8 राज्यों से बिहार लाए गए 200 सॉल्वर:50 करोड़ तक की डील, कैंडिडेट्स को दूर बैठाकर देना था एग्जाम, NTA की सुरक्षा कैसे टूटी


री-नीट फर्जीवाड़े की परतें जैसे-जैसे ‎खुल रही हैं, वैसे-वैसे एक ऐसे सॉल्वर सिंडिकेट का चेहरा ‎सामने आ रहा है, जिसे MBBS के छात्र ‎चला रहे थे। केंद्र सरकार ने सख्ती बरतकर पेपर लीक होने से तो रोक लिया, लेकिन बिहार में मेडिकल के छात्रों ने NTA की सुरक्षा में सेंध लगा दी। सॉल्वर सिंडिकेट का सरगना मुजफ्फरपुर का अर्पित यादव है। उसने कोटा में पढ़ाई के दौरान तीन दोस्तों के साथ मिलकर गिरोह बनाया था। री-नीट-यूजी 2026 में बिहार में करीब 200 फर्जी परीक्षार्थियों के बैठाने की प्लानिंग थी। ये मेडिकल स्टूडेंट्स 8 राज्यों से बिहार बुलाए गए। जिनकी जगह पर पेपर देना था, उन कैंडिडेट्स से करीब 50 करोड़ रुपए तक की डील हुई। औसतन हर कैंडिडेट से 40 लाख रुपए लेने थे। ये चौंकाने वाले तथ्य लोकल पुलिस, EOU और अन्य जांच एजेंसियों की रिपोर्ट में सामने आए हैं। री-नीट-यूजी 2026 में सॉल्वर गैंग ने कैसे फर्जीवाड़ा किया? किस तरह फर्जी परीक्षार्थी बैठाए? गैंग में कौन से लोग शामिल हैं? पढ़िए स्पेशल रिपोर्ट मेडिकल की तैयारी करने कोटा गया, बनाई सॉल्वर गैंग अर्पित ने राजस्थान के कोटा में सॉल्वर गैंग शुरू की थी। वह मेडिकल की तैयारी करने गया था। कोचिंग में उसकी दोस्ती मयंक कुमार (अश्विनी कुमार), रंजीत कुमार और रवि शंकर से हुई। चारों ने मिलकर फर्जी परीक्षार्थी बैठाने का खेल शुरू किया। अपने गिरोह से कोटा में कई कोचिंग में पढ़ने वाले छात्रों को जोड़ लिया। खुद मेडिकल की तैयारी करने और बाद में MBBS के छात्र होने के चलते इन्हें आसानी से सॉल्वर मिल गए। री-नीट-यूजी 2026, गिरोह ने बुलाए 200 फर्जी परीक्षार्थी री-नीट फर्जीवाड़ा की जांच आर्थिक अपराध इकाई (ईओयू) और पुलिस कर रही है। सूत्रों के अनुसार पता चला है कि सॉल्वर गैंग ने बिहार में करीब 200 फर्जी परीक्षार्थियों को बुलाया था। इनमें से 9 परीक्षा के दौरान लखीसराय में पकड़े गए। एक हाजीपुर में पकड़ा गया। मेडिकल कॉलेजों में पढ़ने वाले कुल 12 छात्र पकड़े गए हैं। नालंदा मेडिकल कॉलेज से दो छात्र गायब, अन्य की भी तलाश जांच में सामने आया है कि बिहार के नालंदा मेडिकल कॉलेज से दो छात्र गायब हैं। इसके अलावा अन्य मेडिकल कॉलेज से भी कुछ छात्रों के भी पेपर के दिन से अनुपस्थित होने की सूचना मिल रही है। पुलिस उनको तलाश रही है। उनसे पूछताछ करेगी। री- नीट के दिन PMCH के 88 छात्र अबसेंट, विभाग ने जवाब मांगा
इधर, री-नीट-यूजी 2026 परीक्षा के दौरान PMCH के 88 अनुपस्थित एमबीबीएस छात्र अब स्वास्थ्य विभाग की जांच के दायरे में हैं। विभाग ने मामले को गंभीर मानते हुए PMCH प्रशासन से इन छात्रों का पूरा रिकॉर्ड मांगा है। इसमें नाम, रोल नंबर, बैचवार सूची, नामांकन रिकॉर्ड और अनुपस्थिति से जुड़ी जानकारी शामिल है। स्वास्थ्य विभाग को भेजी गई सूची में एमबीबीएस के 2022, 2023, 2024 और 2025 बैच के छात्र शामिल हैं। PMCH सूत्रों के अनुसार, सबसे अधिक 39 छात्र वर्ष 2024 बैच के अबसेंट पाए गए। इसके अलावा 2023 बैच के 19 छात्र कॉलेज नहीं पहुंचे थे। शेष छात्र 2022 और 2025 बैच से संबंधित हैं। कई छात्रों ने गैर हाजिरी की कोई पहले से सूचना भी कॉलेज प्रशासन को नहीं दी थी।जानकारों का कहना है कि 2024 बैच के छात्र हाल में ही नीट परीक्षा पास कर मेडिकल कॉलेज पहुंचे हैं। इसलिए वे नीट के प्रश्न हल करने में अपेक्षाकृत अधिक सक्षम माने जाते हैं। 8 राज्यों में फैला है गिरोह का नेटवर्क अब तक की जांच से पता चला है कि सॉल्वर गैंग का नेटवर्क आठ राज्यों में फैला है। बिहार, मध्य प्रदेश, ओडिशा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, राजस्थान और झारखंड में पढ़ रहे मेडिकल के छात्रों से इस गिरोह के शातिर संपर्क में हैं। इसमें अधिकतर बिहार के छात्र हैं। कुछ सॉल्वर दूसरे राज्यों के भी हैं। पुलिस को शक है कि यह गिरोह बीते तीन साल से मेडिकल की परीक्षा में फर्जी परीक्षार्थी बैठा रहा है। फर्जी निकला अर्पित यादव का पता गैंग के सरगना अर्पित यादव ने खुद को भगवानपुर थाना क्षेत्र के यादव नगर के पवन कुमार सिंह का बेटा बताया है। हालांकि, पुलिस जांच में उसका पता और पिता का नाम दस्तावेजों से मेल नहीं खाया। पता फर्जी निकला है। 50 करोड़ से अधिक की डील, सॉल्वर को देते थे 15-20 लाख जांच के क्रम में पता चला है कि सॉल्वर गैंग ने परीक्षार्थियों से नीट-यूजी 2026 की परीक्षा पास कराने के लिए 30-40 लाख रुपए लिए। पैसे छात्र की आर्थिक क्षमता के अनुसार कम या अधिक भी होते थे। गिरोह ऐसे परीक्षार्थियों को टारगेट करता है जो पैसे वाले घर से हैं। एक दो बार खुद परीक्षा दे चुके हैं, लेकिन सफलता नहीं मिली। गिरोह के लोग असली परीक्षार्थी की जगह फर्जी परीक्षार्थी या सॉल्वर को बैठाते थे। उन्हें एक बार परीक्षा में बैठने पर 15-20 लाख रुपए मिलते थे। सूत्रों के अनुसार इस बार की परीक्षा में बिहार में सॉल्वर गैंग ने 50 करोड़ रुपए से अधिक का खेल किया था। क्यों दूसरे की जगह परीक्षा देने को तैयार हो गए MBBS के छात्र? पकड़े गए फर्जी परीक्षार्थियों में से ज्यादातर सरकारी मेडिकल कॉलेज में पढ़ने वाले MBBS छात्र हैं। अब इनके डॉक्टर बनने का सपना टूटता दिख रहा है। ऐसे में सवाल है कि MBBS के छात्र गिरोह के जाल में कैसे फंस जाते हैं? इन चारों ने बनाई सॉल्वर गैंग 1- अर्पित सिंह: मुजफ्फरपुर का अर्पित सिंह पूरा नेटवर्क संभाल रहा था। असली परीक्षार्थियों से संपर्क करने, पैसे लेने, सॉल्वर चुनने और बायोमेट्रिक जांच एजेंसी को सेट करने में इसकी बड़ी भूमिका है। पुलिस ने मगध मेडिकल कॉलेज स्थिति हॉस्टल में अर्पित के रूम में छापेमारी की है। यहां से एक टैब मिला है। इसकी जांच की जा रही है। 2- अश्विनी कुमार उर्फ मयंक: अश्विनी PMCH में MBBS का छात्र है। पता चला है कि इसने गिरोह को कुछ अभ्यर्थी भी लाकर दिए थे। इसके लिए प्रति अभ्यर्थी 60 लाख रुपए में डील की थी। 25 लाख रुपए खुद लिए थे। अश्विनी लखीसराय के एक सेंटर में बायोमेट्रिक कर्मी बनकर घुसा था। फर्जी अभ्यर्थियों को प्रवेश दिलाने में अहम भूमिका निभाई। अंदर बैठे परीक्षार्थियों की मदद कर रहा था। 3. रविशंकर: अर्पित के कहने पर काम करता था। इसने 2025 में नीट में अपनी पत्नी की जगह सॉल्वर को बैठाया, लेकिन वह पकड़ी गई। इस साल भी रविशंकर ने पत्नी की जगह सॉल्वर के रूप में पूनम को परीक्षा देने भेजा, लेकिन वह पकड़ी गई। 4. रंजीत कुमार: सॉल्वर गैंग के शुरुआती लोगों में से एक है। इसने अपने भाई संजीत कुमार की जगह मंतोष को सॉल्वर के रूप में परीक्षा केंद्र भेजा। पश्चिम बंगाल के न्यू जलपाईगुड़ी मेडिकल कॉलेज में पढ़ने वाला मंतोष 21 जून को लखीसराय में परीक्षा केंद्र से गिरफ्तार हुआ। 20-20 हजार में बिक गए बायोमेट्रिक एजेंसी के लोग सॉल्वर गैंग ने बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन में सेंध लगाकर असली अभ्यर्थियों की जगह दूसरे लोगों को बैठाने की कोशिश की। लखीसराय में 18 बायोमेट्रिक कर्मी गिरफ्तार किए गए हैं। छात्रों के बायोमेट्रिक जांच के लिए लगाए गए कई कर्मी 400 रुपए रोज के भुगतान पर रखे गए थे। सॉल्वर गैंग ने इन्हें प्रति फर्जी परीक्षार्थी 20-20 हजार रुपए दिए। ब्लैकलिस्ट कंपनी को मिला ठेका एनटीए ने री-नीट परीक्षा के लिए बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन का ठेका ईडीसीआईएल को दिया था। ईडीसीआईएल ने यह काम ‘इनोवेटिव व्यू’ कंपनी को सौंप दिया। झारखंड और तमिलनाडु सरकार ने 2025 में और यूपी सरकार ने 2022 में ‘इनोवेटिव व्यू’ को बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन के लिए ब्लैकलिस्ट किया था। इसके बाद भी बिहार में इस कंपनी को काम मिला। जांच के क्रम में पता चला है कि गिरोह ने बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन एजेंसी को ही सेट कर लिया था। जांच में नालंदा के प्रमोद कुमार की भूमिका सामने आई है। उसने ‘इनोवेटिव व्यू’ एजेंसी के माध्यम से लखीसराय के तीनों परीक्षा केंद्रों पर बायोमेट्रिक सत्यापन का टेंडर लिया था। लखीसराय पुलिस उसकी गिरफ्तारी के लिए छापेमारी कर रही है। पुलिस के अनुसार रविशंकर ने प्रमोद यादव से संपर्क कर पूरी व्यवस्था तैयार की थी। प्रमोद यादव ने अपने भरोसेमंद लोगों को बायोमेट्रिक कर्मी और सुपरवाइजर के रूप में तैनात किया था। रविशंकर ने मूल परीक्षार्थियों के एडमिट कार्ड पर तस्वीरों में छेड़छाड़ की थी। गिरफ्तार सुपरवाइजर विशाल कुमार और बादल कुमार ने पूछताछ में बताया कि प्रमोद यादव ने पहले ही निर्देश दिया था कि यदि किसी सॉल्वर का फिंगरप्रिंट या डेटा मूल परीक्षार्थी से मेल नहीं खाए, तब भी उसे सत्यापित दिखाकर परीक्षा कक्ष में प्रवेश दे दिया जाए। ऐसे रची गई बायोमेट्रिक हैक की साजिश

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