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कानपुर देहात की भोगनीपुर विधानसभा सीट से विधायक और योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री राकेश सचान बुधवार से चर्चा में हैं। राकेश सचान बुधवार को राज्यसभा चुनाव के नामांकन के दौरान लखनऊ में थे। इसी दौरान उनकी एक तस्वीर सपा प्रमुख अखिलेश यादव और अन्य सपा नेताओं के साथ सामने आई। तस्वीर वायरल होने के बाद राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग को लेकर कयास लगाए जाने लगे। भोगनीपुर की मौजूदा सियासत को समझने के लिए पहले राकेश सचान के राजनीतिक सफर पर नजर डालना जरूरी है। राकेश सचान ने अपनी राजनीति समाजवादी पार्टी से शुरू की। वह 1993 और 2002 में घाटमपुर से सपा के विधायक रहे। 2009 में सपा के टिकट पर फतेहपुर से लोकसभा चुनाव जीतकर संसद पहुंचे। उन्हें मुलायम सिंह यादव और शिवपाल सिंह यादव के करीबी नेताओं में गिना जाता रहा है। 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले उन्होंने सपा छोड़कर कांग्रेस का रुख किया और फतेहपुर से चुनाव लड़ा। इसके बाद 2022 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उन्होंने कांग्रेस छोड़कर बीजेपी का दामन थाम लिया। बीजेपी ने उन्हें भोगनीपुर से अपना प्रत्याशी बनाया। राकेश सचान को बीजेपी का टिकट मिलने के साथ ही भोगनीपुर में पार्टी के भीतर विरोध भी सामने आया था। 2017 में इसी सीट से बीजेपी के विधायक रहे विनोद कुमार कटियार का टिकट काटकर राकेश सचान को प्रत्याशी बनाया गया था। टिकट की घोषणा के बाद कटियार समर्थकों ने पार्टी कार्यालय में विरोध और नारेबाजी की थी। उस समय स्थानीय संगठन के एक हिस्से की नाराजगी की खबरें भी सामने आई थीं। हालांकि चुनावी नतीजे बीजेपी के पक्ष में रहे। 2022 में राकेश सचान को 87 हजार 809 वोट मिले और उन्होंने समाजवादी पार्टी के नरेंद्र पाल सिंह को 11 हजार 893 वोट से हराया। नरेंद्र पाल सिंह को 75 हजार 916 वोट मिले, जबकि बहुजन समाज पार्टी के जुनैद खान 47 हजार 332 वोट के साथ तीसरे स्थान पर रहे। यानी बीजेपी के राकेश सचान और सपा के नरेंद्र पाल सिंह के बीच जितने वोट का अंतर था, उससे लगभग चार गुना वोट जुनैद के खाते में गए थे। यही आंकड़ा अब 2027 की राजनीति में चर्चा का विषय है। 2022 में बीजेपी, सपा और बीएसपी के बीच वोट तीन प्रमुख हिस्सों में बंटे थे। अब जुनैद पहलवान सपा के साथ हैं। ऐसे में एक सवाल यह है कि 2022 में बीएसपी के खाते में गए वोटों में से कितना हिस्सा जुनैद के व्यक्तिगत प्रभाव से जुड़ा था और कितना पार्टी या स्थानीय समीकरणों से। इसका जवाब चुनाव के दौरान ही सामने आएगा, क्योंकि किसी उम्मीदवार को मिले पूरे वोट को उसका स्थायी व्यक्तिगत वोट बैंक मानना चुनावी आंकड़ों के आधार पर उचित नहीं होगा। जुनैद की सपा में एंट्री को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि अखिलेश यादव ने खुद 2022 के चुनाव का जिक्र करते हुए कहा था कि अगर उस समय जुनैद को मना लिया गया होता तो सपा का एक विधायक और बढ़ जाता। यानी सपा नेतृत्व भी भोगनीपुर में जुनैद के 2022 के प्रदर्शन को राजनीतिक संदर्भ में देख रहा है। अब सवाल यह है कि 2027 में सपा जुनैद को ही मैदान में उतारती है या किसी दूसरे चेहरे पर भरोसा करती है। अगर उम्मीदवार कोई और होता है तो जुनैद की भूमिका क्या रहती है और वह पार्टी प्रत्याशी के लिए किस स्तर तक सक्रिय होते हैं, यह भी चुनावी समीकरण का हिस्सा होगा। पिछले तीन विधानसभा चुनावों में बदली तस्वीर भोगनीपुर के पिछले चुनावों का रिकॉर्ड बताता है कि यहां मुकाबला हमेशा एकतरफा नहीं रहा है। 2012 में समाजवादी पार्टी के योगेंद्र पाल सिंह ने 57 हजार 555 वोट लेकर चुनाव जीता था। उनकी जीत का अंतर 4 हजार 653 वोट रहा था। 2017 में बीजेपी के विनोद कुमार कटियार ने 71 हजार 466 वोट हासिल कर बीएसपी के धर्मपाल सिंह भदौरिया को 19 हजार 5 वोट से हराया था। इसके बाद 2022 में राकेश सचान बीजेपी के टिकट पर जीते, लेकिन उनकी जीत का अंतर 2017 के मुकाबले घटकर 11 हजार 893 वोट रह गया। 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा को बढ़त 2024 का लोकसभा चुनाव भी भोगनीपुर की तस्वीर का एक महत्वपूर्ण आंकड़ा है। जालौन लोकसभा सीट के तहत आने वाले भोगनीपुर विधानसभा क्षेत्र में 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के नारायण दास अहिरवार को 1 लाख 6 हजार 873 वोट मिले, जबकि बीजेपी के भानु प्रताप सिंह वर्मा को 75 हजार 848 वोट मिले। बीएसपी को 20 हजार 17 वोट मिले। इस तरह भोगनीपुर विधानसभा क्षेत्र में सपा को बीजेपी के मुकाबले 31 हजार 25 वोट की बढ़त मिली थी। हालांकि लोकसभा और विधानसभा चुनाव के आंकड़ों की सीधी तुलना नहीं की जा सकती। लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय मुद्दे, गठबंधन और संसदीय प्रत्याशी का प्रभाव अलग होता है, जबकि विधानसभा चुनाव में स्थानीय उम्मीदवार, संगठन, व्यक्तिगत पकड़ और स्थानीय मुद्दे भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए 2024 में सपा को मिली बढ़त को 2027 के विधानसभा चुनाव का सीधा संकेत मानना उचित नहीं होगा। लेकिन यह आंकड़ा इतना जरूर बताता है कि 2022 के विधानसभा चुनाव के बाद भोगनीपुर के वोटिंग पैटर्न में बदलाव देखने को मिला था। बीजेपी में विनोद कटियार का नाम फिर चर्चा में इसी बीच बीजेपी के भीतर भोगनीपुर की राजनीति में एक पुराना नाम फिर चर्चा में है—विनोद कुमार कटियार। 2017 में विधायक रहे कटियार 2022 में टिकट से वंचित रह गए थे। उस समय उनके समर्थकों की नाराजगी सार्वजनिक रूप से सामने आई थी। अब अगर 2027 में बीजेपी फिर राकेश सचान को प्रत्याशी बनाती है तो पार्टी के भीतर टिकट को लेकर पुराने समीकरण और संगठनात्मक तालमेल भी चर्चा का विषय रहेंगे। वहीं अगर पार्टी किसी दूसरे चेहरे पर विचार करती है तो उसका असर भोगनीपुर की चुनावी रणनीति पर पड़ सकता है। फिलहाल टिकट को लेकर कोई अंतिम निर्णय सामने नहीं आया है। सामाजिक समीकरण भी अहम भोगनीपुर के सामाजिक समीकरण की बात करें तो यहां कई जातीय और सामाजिक समूह चुनावी राजनीति को प्रभावित करते हैं। दलित, मुस्लिम, यादव, कुर्मी, पाल, कुशवाहा, निषाद, ब्राह्मण और क्षत्रिय समेत अलग-अलग समुदायों की मौजूदगी है। स्थानीय राजनीतिक आकलनों में अलग-अलग समुदायों की संख्या के अलग-अलग अनुमान मिलते हैं। इसलिए इन्हें आधिकारिक आंकड़ों की तरह पेश करना उचित नहीं होगा। इतना जरूर है कि भोगनीपुर में गैर-यादव ओबीसी समूहों के साथ दलित, मुस्लिम और अन्य सामाजिक समूहों का वोट किसी भी प्रमुख दल के चुनावी गणित में महत्वपूर्ण माना जाता है। बीएसपी भी इस पूरे समीकरण का एक अहम हिस्सा रही है। 2017 में बीएसपी के धर्मपाल सिंह भदौरिया को 52 हजार 461 वोट मिले थे। 2022 में जुनैद खान को 47 हजार 332 वोट मिले। वहीं 2024 के लोकसभा चुनाव में भोगनीपुर विधानसभा क्षेत्र में बीएसपी के खाते में 20 हजार 17 वोट आए। यानी पिछले तीन चुनावों में बीएसपी के वोट में बड़ा उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। अब अगर 2027 में बीएसपी मजबूत प्रत्याशी उतारती है तो मुकाबले का एक अलग कोण बनेगा। वहीं अगर पार्टी कमजोर प्रत्याशी के साथ मैदान में रहती है तो 2022 की तरह उसके वोटों का आकार कितना रहता है, यह देखने वाली बात होगी। फिलहाल भोगनीपुर में बीएसपी के उम्मीदवार को लेकर तस्वीर साफ नहीं है।
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