'न विधायक न MLC, कैसे मंत्री बने हैं दीपक प्रकाश':SC ने सम्राट सरकार से पूछा, कुशवाहा ने BJP से बढ़ाई दूरी!, अब इस्तीफा ही विकल्प?


राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश बिहार सरकार में कब तक मंत्री बने रहेंगे? यह सवाल सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी के बाद एक बार फिर चर्चा में है। कोर्ट ने सम्राट सरकार से जवाब मांगा है। …तो क्या अब दीपक प्रकाश के पास इस्तीफा देना ही आखिरी विकल्प है, सब जानने के बाद भी कुशवाहा बेटे से इस्तीफा क्यों नहीं दिलवा रहे, समझेंगे; बूझे की नाही में…। सवाल-1ः दीपक प्रकाश के मंत्री पद को सुप्रीम कोर्ट में किसने और क्यों चुनौती दी है? जवाबः सामाजिक कार्यकर्ता राकेश कुमार सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दायर कर संविधान के ऑर्टिकल 164(4) के तहत बिहार सरकार के पंयाचती राज मंत्री दीपक प्रकाश की पुनर्नियुक्ति को अवैध बताया है। उनका तर्क है कि एक ही विधानसभा के कार्यकाल के भीतर सिर्फ सरकार बदलने या मुख्यमंत्री बदलने का बहाना बनाकर किसी गैर-विधायक को दोबारा 6 महीने की छूट देकर मंत्री नहीं बनाया जा सकता। याचिका में कहा गया है कि पहली बार मंत्री बनने के बाद से बिना चुनाव जीते मंत्री रहने की जो 6 महीने की तय अवधि होती है, वह 20 मई, 2026 को ही समाप्त हो चुकी है। याचिका के मुताबिक, सरकार बदलने, इस्तीफा देने या मंत्रिमंडल के पुनर्गठन का सहारा लेकर इस 6 महीने की समय-सीमा को ‘रीसेट’ (शुरू से शुरू) नहीं किया जा सकता। दरअसल… संविधान के ऑर्टिकल 164(4) के मुताबिक… सवाल-2ः सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा है? जवाबः इस मामले पर 30 जुलाई को सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने बिहार सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा है कि बिना चुनाव जीते 6 महीने की अनिवार्य अवधि बीत जाने के बाद भी कोई मंत्री अपने पद पर कैसे बना रह सकता है। CJI सूर्यकांत ने कहा, ‘यह पूरी तरह से कानून से जुड़ा सवाल है। राज्य सरकार को यह समझाना होगा कि बिना निर्वाचित हुए कोई मंत्री 6 महीने से ज्यादा समय तक पद पर कैसे बना रह सकता है।’ अगली सुनवाई 4 अगस्त को होगी। सवाल-3ः …तो क्या दीपक प्रकाश के सामने इस्तीफा देना ही विकल्प बचा है? जवाबः बिल्कुल। इसको संवैधानिक और राजनीतिक दोनों कारणों से समझिए… संवैधानिक कारणः कोर्ट ने अपने 2001 के फैसले को दोहराया तो जाएगी कुर्सी 2001 में सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे ही एक केस में ऐतिहासिक फैसला दिया था। याचिकाकर्ता राकेश कुमार सिंह ने उस फैसले का जिक्र इस केस में भी किया है। अगर सुप्रीम कोर्ट 2001 वाले अपने एसआर चौधरी फैसले की कड़ाई से व्याख्या करता है तो दीपक प्रकाश की पुनर्नियुक्ति को ‘असंवैधानिक और शून्य’ घोषित किया जा सकता है। क्या है 2001 का वह केस, जिससे दीपक की कुर्सी खतरे में है… सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ (तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डॉ. ए.एस. आनंद, जस्टिस आर.सी. लाहोटी और जस्टिस के.जी. बालकृष्णन) ने कहा… राजनीतिक कारणः फिलहाल कोई चुनाव नहीं, देना ही होगा इस्तीफा मान लीजिए…अगर सुप्रीम कोर्ट ने दीपक प्रकाश की नियुक्ति को रद्द या शून्य नहीं भी घोषित करती है, बहाल रखती है तब भी दीपक प्रकाश को इस्तीफा देना ही होगा। इसे ऐसे समझिए… अगर उनकी मां स्नेहलाता कुशवाहा अपने विधायक पद से इस्तीफा भी देतीं हैं तब भी उनकी राह अब आसान नहीं लगती। जैसे- अगर उन्होंने 31 जुलाई 2026 को अपनी विधायकी छोड़ी तब उस पर उपचुनाव 31 जनवरी 2027 से पहले होगा। अमूमन सीट खाली करने के 3 से 4 महीने बाद ही चुनाव होता है। तुरंत चुनाव नहीं होता। उदाहरण स्वरूप नितिन नवीन की सीट का उपचुनाव ही ले लीजिए। नितिन नवीन ने 30 मार्च को बांकीपुर से विधानसभा सीट से इस्तीफा दिया। चुनाव 30 जुलाई 2026 को हुआ, रिजल्ट 3 अगस्त को आएगा। मतलब 4 महीने बाद। जबकि, दीपक प्रकाश के पास मंत्री पद बचाने के लिए सिर्फ 3 महीने बाकी है। सवाल-4ः सब जानने के बाद भी कुशवाहा बेटे से इस्तीफा क्यों नहीं दिलवा रहे? जवाबः उपेंद्र कुशवाहा ने सार्वजनिक तौर पर कहा है कि दीपक प्रकाश दो-चार महीने के लिए नहीं, बल्कि 2030 तक पूरा कार्यकाल करने के लिए मंत्री बने हैं। वह सिर्फ हमारी पार्टी की मर्जी से नहीं NDA की सहमति से बने हैं। सीनियर जर्नलिस्ट इंद्रभूषण कहते हैं, ‘हाल में हुए बिहार विधान परिषद (MLC) चुनाव में भाजपा ने अपने कोटे से दीपक प्रकाश को उम्मीदवार नहीं बनाया, जिससे कुशवाहा नाराज हैं।’ इंद्रभूषण कहते हैं, ‘कुशवाहा जानते हैं कि बिहार में आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए लव-कुश (कुर्मी-कोइरी/कुशवाहा) समीकरण भाजपा के लिए कितना अहम है। वह मंत्री पद को इतनी आसानी से छोड़कर अपनी राजनीतिक ताकत को कम नहीं करना चाहते।’ सवाल-5ः क्या कुशवाहा भाजपा से नाराज हैं? जवाबः सीधे तौर पर नहीं कहा जा सकता, लेकिन हाल की उपेंद्र कुशवाहा की गतिविधियों को देखें तो लग रहा है कि उन्होंने भाजपा से दूरी बढ़ाई है। जैसे- बांकीपुर उपचुनाव में ना कुशवाहा दिखे ना दीपक प्रकाश। उपेंद्र कुशवाहा 9 जुलाई को अभिषेक कुमार बंटी के नामांकन समारोह में शामिल हुए थे, लेकिन बंटी ने नाम वापस ले लिया। इसके बाद प्रत्याशी बने नीरज कुमार सिन्हा के प्रचार में नहीं गए। जबकि, इससे इतर NDA के हर नेता ने प्रचार किया। जिन्होंने प्रचार नहीं किया, उन्होंने वीडियो संदेश या X पर पोस्ट कर ही वोट देने की अपील की। कुशवाहा और दीपक प्रकाश ने ऐसा कुछ नहीं किया।

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