नगर निगम के मकानों पर कब्जे का दावा खारिज:अलीगढ़ का मामला, हाईकोर्ट ने कहा–सिर्फ लंबे समय तक रहने से सरकारी जमीन आपकी नहीं हो जाती


अलीगढ़ में दोदपुर सिविल लाइन थाने के पीछे सरकारी आवासों के मामले में उच्च न्यायालय ने कब्जाधारियों को करारा झटका दिया है। दशकों से मकानों पर कब्जा कर बैठे कब्जाधारियों की अपील को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि महज लंबे समय तक कब्जा बनाए रखने से, चाहे वह कितने भी समय का हो, किसी सार्वजनिक या सरकारी संपत्ति पर कोई कानूनी अधिकार या टाइटल पैदा नहीं हो जाता। एक साथ ‘किराएदार’ और ‘मालिक’ दोनों बनने की कोशिश नगर आयुक्त प्रेम प्रकाश मीणा ने बताया कि ​इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शफीकुर रहमान एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के दावों में गंभीर विरोधाभास पाया। कोर्ट ने अपने फैसले में सबसे बड़ा बिंदु यह उठाया कि याचिकाकर्ता अपने मालिकाना हक को लेकर खुद ही भ्रमित थे। ​पहले दावे में याचिकाकर्ताओं ने खुद को नगर निगम का किराएदार बताया और कहा कि उनके पूर्वज दशकों से नियमित रूप से किराया देते आ रहे थे। वहीं, दूसरे दावे में बहस के दौरान उनके वकील ने तर्क दिया कि उन्होंने 1993 में ही फ्रीहोल्ड अधिकारों के लिए पैसा जमा कर दिया था, जिससे वे वहां के वैध मालिक (आवंटी) बन गए। ठोस साक्ष्य नहीं सके प्रस्तुत ​हाईकोर्ट ने टिप्पणी में कहा कि कानूनन कोई भी व्यक्ति एक ही समय पर किराएदार और मालिक (या फ्रीहोल्ड धारक) होने का दोहरा दावा नहीं कर सकता। इन दोनों ही दावों को साबित करने के लिए ठोस दस्तावेजों की जरूरत होती है, जिसे याचिकाकर्ता कोर्ट के सामने पेश करने में पूरी तरह नाकाम रहे। ​रसीदें भी निकलीं मिसमैच ​सुनवाई के दौरान जब कब्जाधारियों के दस्तावेजों की जांच हुई, तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। याचिकाकर्ताओं के पास न तो कोई अलॉटमेंट लेटर था, न रेंट एग्रीमेंट और न ही नगर निगम के हाउस रजिस्टर या म्यूनिसिपल रिकॉर्ड में उनका नाम दर्ज था। उन्होंने जो रसीदें कोर्ट में दिखाईं, वे विवादित जमीन प्लॉट नंबर 78 और 87 की नहीं थीं। वे किसी अन्य नजूल प्लॉट (नंबर 273 और 275) से संबंधित थीं। इन रसीदों पर कहीं भी यह दर्ज नहीं था कि यह पैसा क्वार्टर के किराए के रूप में लिया गया है। 2009 तक नगर निगम के पास नहीं था मालिकाना हक राज्य सरकार ने इस विवादित जमीन की फ्रीहोल्ड डीड 26 सितंबर 2009 को नगर निगम, अलीगढ़ के पक्ष में निष्पादित की थी। नगर आयुक्त का कहना है कि जब 2009 तक खुद नगर निगम के पास उस जमीन का पूर्ण मालिकाना हक नहीं था, तो याचिकाकर्ता 1993 में ही उस पर फ्रीहोल्ड अधिकार पाने का दावा कैसे कर सकते हैं? कोर्ट ने माना कि सिर्फ बैंक या निगम में कोई रकम जमा कर देने से तब तक कानूनी हक नहीं मिलता, जब तक आधिकारिक रजिस्ट्री या अलॉटमेंट न हो। नगर आयुक्त का आदेश वैध, बिना बल प्रयोग खाली हुए मकान ​उच्च न्यायालय ने नगर आयुक्त द्वारा 15 मई 2026 को पारित किए गए बेदखली के आदेश को पूरी तरह वैध और सही ठहराया। कोर्ट ने माना कि नगर आयुक्त ने याचिकाकर्ताओं को अपनी बात रखने का पूरा और निष्पक्ष मौका दिया था। ‘बल प्रयोग करने की बजाय शांतिपूर्ण प्रक्रिया का करें पालन’ याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने मानवीय आधार पर यह सुरक्षा जरूर दी कि नगर निगम जब भी इन्हें हटाए, तो बल प्रयोग करने के बजाय कानून द्वारा तय की गई उचित और शांतिपूर्ण प्रशासनिक प्रक्रिया का पालन करे। नगर आयुक्त का कहना है कि उच्चन्यायालय के आदेश का पालन होगा। पहले भी बिना बल प्रयोग किए ही मकानों को कब्जा मुक्त कराया है। ​सार्वजनिक संपत्ति पर अवैध कब्जा बर्दाश्त नहीं नगर आयुक्त प्रेम प्रकाश मीणा ने कहा कि सरकारी संपत्तियां और शासकीय भवन जनहित की धरोहर हैं। इनका उपयोग केवल शासकीय सेवा में रहने वाले अधिकृत अधिकारियों और कर्मचारियों द्वारा ही किया जा सकता है। सार्वजनिक संपत्तियों पर किसी भी प्रकार का अवैध कब्जा स्वीकार्य नहीं है। भविष्य में भी ऐसे मामलों में माननीय न्यायालय के निर्देशों और कानून के दायरे में रहकर इसी तरह कठोर कार्रवाई निरंतर जारी रहेगी।

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