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तकनीक के तेजी से बदलते दौर में महात्मा गांधी का जनसंचार मॉडल आज और अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। गांधीजी केवल अपनी बातों से ही नहीं, बल्कि अपनी देह भाषा और व्यवहार से भी लोगों तक संदेश पहुंचाते थे। उनके जनसंचार का माध्यम सहयोग के साथ-साथ सत्याग्रह भी था। नई पीढ़ी के लिए गांधीजी के जनसंचार के इस मॉडल को समझना जरूरी है। यह बात इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सेंटर ऑफ मीडिया स्टडीज के पाठ्यक्रम समन्वयक डॉ. धनंजय चोपड़ा ने कही। डॉ. चोपड़ा लोक मीडिया शोध अकादमी की ओर से आयोजित महात्मा गांधी स्मारक व्याख्यान में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि गांधीजी संचार की भाषा में भी अहिंसा का भाव रखने पर जोर देते थे। वे ऐसे शब्दों के कम इस्तेमाल की बात करते थे, जो हिंसात्मक या सामाजिक रूप से नकारात्मक प्रवृत्तियों को बढ़ावा देते हैं। जनता के धैर्य और संयम का पोषक हो जनसंचारक उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी के अनुसार जनसंचारक केवल जनता की आकांक्षाओं और सपनों का विश्लेषक नहीं होता, बल्कि उसके धैर्य और संयम को मजबूत करने वाला भी होता है। इसलिए जनसंचारक को अपनी भाषा, व्यवहार और प्रस्तुति को लेकर विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। फेक न्यूज से बचाने में मददगार होगा गांधी मॉडल डॉ. चोपड़ा ने कहा कि आने वाले समय में तकनीक का प्रभाव और बढ़ेगा। ऐसे दौर में गांधीजी का जनसंचार मॉडल आम लोगों को फेक न्यूज और मिसइन्फॉर्मेशन से बचाने में मददगार साबित हो सकता है। व्याख्यान से पहले गांधीजी के प्रिय भजनों का गायन किया गया। अकादमी की निदेशक रजनी ने अतिथियों का स्वागत किया और गांधीजी के जीवन से सीख लेने का आह्वान किया। कार्यक्रम में संस्था के पदाधिकारी और जनसंचार के विद्यार्थी मौजूद रहे।
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जनसंचार का ‘गांधियन मॉडल’ अपनाना जरूरी: डॉ. धनंजय चोपड़ा:बोले- फेक न्यूज और मिसइन्फॉर्मेशन से बचाने में मददगार