लखनऊ विवि में 'आत्मबोध से विश्वबोध' पर संगोष्ठी:RSS प्रचारक स्वान्त रंजन बोले- अंग्रेजों ने इतिहास विकृत किया


अखिल भारतीय साहित्य परिषद के युवा शोधार्थी आयाम द्वारा शनिवार को लखनऊ विश्वविद्यालय के मालवीय सभागार में ‘आत्मबोध से विश्वबोध’ विषय पर एक अहम संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस दौरान वक्ताओं ने भारतीय संस्कृति, विकृत इतिहास और स्वदेशी भाषाओं के महत्व पर बेबाकी से अपनी बात रखी। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के अखिल भारतीय प्रचारक प्रमुख स्वान्त रंजन ने कहा कि स्वधर्म, स्वदेश और स्वराज्य ही हमारे स्वबोध की प्रेरणा हैं। उन्होंने कहा कि अंग्रेजों ने जानबूझकर भारत के इतिहास को विकृत किया। हमारा इतिहास ऐसे तथाकथित इतिहासकारों से लिखवाया गया, जो कभी भारत आए ही नहीं थे। परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री डॉ. पवनपुत्र बादल ने कहा कि हमारी सनातन परंपरा में ही ‘वसुधैव कुटुंबकम’ का भाव छिपा है। उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे अपनी स्थानीय भाषा और बोली से गहरा जुड़ाव रखें। भारत की भाषाएं ही देश को एकात्म करती हैं। अपने मूल को छोड़कर हम विश्वबोध तक नहीं पहुंच सकते। मोदी-योगी के राज में निखर रही अयोध्या अयोध्या के बावन मंदिर के महंत वैदेही वल्लभ शरण महाराज ने कहा कि भारत का साहित्य सर्वश्रेष्ठ है और भारत हमेशा से विश्वगुरु था, है और रहेगा। उन्होंने कहा कि आज पीएम मोदी और सीएम योगी के शासनकाल में अयोध्या लगातार विकास कर रही है। भव्यता के साथ रामलला विराजमान हैं और अयोध्या के तमाम मंदिरों का कायाकल्प हो रहा है। कविता के जरिए दिया ‘आत्मबोध’ का संदेश झारखंड (जमशेदपुर) से आईं परिषद की महानगर सचिव व कवयित्री सोनी सुगंधा ने अपनी स्वरचित कविता के जरिए पूरे विषय का सार प्रस्तुत किया। उन्होंने पढ़ा- ‘आएं मिलकर प्रण करते हैं, सुघड़ बनाएं जग हम,आत्मबोध से विश्वबोध की ओर, बढ़ाएं पग हम।जब अंतस के दीप जलेंगे, तब अंधियार मिटेंगे…’ कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुशील चन्द्र त्रिवेदी ने कहा कि भारत को सही मायने में समझने के लिए हमें गुलामी के दौर में थोपे गए साहित्य के बजाय अपने प्राचीन आर्षग्रंथों को पढ़ना होगा। मंच का सफल संचालन युवा शोधार्थी आयाम के प्रमुख आदर्श सिंह ने किया।

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