'जबरन घर में घुसना, महिला पर लेटना अटेम्प्ट-टू-रेप नहीं':पटना हाईकोर्ट ने कहा-पेनिट्रेशन की दिशा में हरकत जरूरी, क्या है रेप के प्रयास की परिभाषा


रात में जबरन घर में घुसकर दीया बुझाना और महिला के ऊपर लेटकर मुंह दबाना अटेम्प्ट टू रेप नहीं, महिला की लज्जा भंग करने का मामला है। पटना हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी करते हुए आरोपी पर से रेप के प्रयास की धारा को हटा दिया। पूरा मामला क्या है, कोर्ट ने क्या कहते हुए निचली अदालत के फैसले को पलट दिया, जानेंगे; बूझे की नाही में…। अटेम्प्ट टू रेप का पूरा मामला क्या है? 8 फरवरी 2010 की रात 10 बजे बेगूसराय की विधवा महिला अपने बच्चे के साथ छप्पर वाले घर में सो रही थी। आरोप है कि महिला पर अधेड़ पहले से गंदी नियत रखता था। उस दिन सुनसान पाकर वह जबरन घर में घुस गया। घर में घुसते ही उसने सबसे पहले दीया को बुझा दिया। फिर महिला के ऊपर लेट गया। महिला जब चिल्लाने लगी तो उसने उसका मुंह दबा दिया। तब तक आसपास के लोग जुट गए। लोगों ने आरोपी की जमकर पिटाई की। गांव वालों ने महिला को पंचायती में मामला सुलझाने का आश्वासन दिया। लेकिन पंचायती के दिन आरोपी नहीं गया। पटना हाईकोर्ट ने क्या कहते हुए अटेम्प्ट टू रेप के आरोप को हटाया? 8 अक्टूबर 2026 को पटना हाईकोर्ट की जस्टिस संदीप कुमार की बेंच ने कहा, ‘किसी व्यक्ति को रेप की कोशिश का दोषी ठहराने के लिए केवल गलत नीयत या अश्लील हरकत पर्याप्त नहीं है। इसके लिए ऐसे ठोस सबूत होने चाहिए।’ जस्टिस संदीप कुमार ने रेप के प्रयास की धारा हटाकर आरोपी को सजा सुनाते वक्त 5 मुख्य बातें कही, जानिए… 1. घर में आरोपी की मौजूदगी साबित हुई हाईकोर्ट ने कहा कि महिला ने आरोपी को अपने घर में देखने और उसकी हरकतों के बारे में स्पष्ट और लगातार बयान दिया था। आरोपी उसी गांव का रहने वाला था और महिला उसे जानती थी। महिला के शोर मचाने पर गांव के लोग वहां पहुंचे और आरोपी को पकड़ लिया। 2. शिकायत दर्ज कराने में दो दिन की देरी से केस खारिज नहीं होगा घटना रात में हुई थी और शिकायत दो दिन के भीतर दर्ज कराई गई थी। इसे लेकर आरोपी के वकील ने महिला के केस दर्ज कराने की नियत पर सवाल उठाया था। इस हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले स्टेट ऑफ पंजाब बनाम गुरमीत सिंह (1996) का हवाला दिया। इस फैसले में कहा गया था- ‘यौन अपराधों के मामलों में शिकायत दर्ज कराने में देरी होना असामान्य नहीं है। सामाजिक बदनामी, शर्म और डर के कारण पीड़िता या उसका परिवार पुलिस के पास जाने से हिचक सकता है।’ पटना हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में विधवा ने पहले गांव के लोगों और पुलिस से संपर्क किया था। इसलिए शिकायत दर्ज कराने में दो दिन की देरी को न तो अस्पष्ट कहा जा सकता है और न ही इसे केस को खारिज करने का आधार बनाया जा सकता है। 3. हर केस में जांच अधिकारी की गवाही जरूरी नहीं इस मामले में जांच अधिकारी को गवाही के लिए पेश नहीं किया गया था। आरोपी ने इसे कोर्ट में आधार बनाया। इस पर हाईकोर्ट ने तखाजी हिराजी बनाम ठकोर कुबेरसिंह चमनसिंह (2001) के फैसले का हवाला देते हुए कहा, ‘यदि उपलब्ध गवाहों की विश्वसनीय गवाही से जरूरी तथ्य साबित हो रहे हों, तो हर अतिरिक्त गवाह को पेश करना अनिवार्य नहीं है।’ 4. महिला की गवाही पर भरोसा, लेकिन रेप की कोशिश का मामला नहीं हाईकोर्ट ने कहा कि अगर पीड़िता की गवाही भरोसेमंद हो, तो केवल उसी के बयान के आधार पर भी सजा सुनाई जा सकती है। हर मामले में उसकी बात की पुष्टि के लिए दूसरे सबूत मांगना जरूरी नहीं है। इस संबंध में कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का उल्लेख किया, जिनमें स्टेट ऑफ पंजाब बनाम गुरमीत सिंह (1996), राय संदीप उर्फ दीपु बनाम स्टेट (2012) और संतोष प्रसाद उर्फ संतोष कुमार बनाम बिहार राज्य (2020) शामिल हैं। 5. रेप की कोशिश साबित करने के लिए जरूरी है… हाईकोर्ट ने कहा कि रेप की कोशिश और अश्लील या आपत्तिजनक हरकत के बीच अंतर करना जरूरी है। हालांकि…,

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