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प्रयागराज में दो साल पहले शुरू हुई डॉ. राजेंद्र प्रसाद नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (RPNLU) में प्रशासनिक विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है। कुलपति डॉ. उषा टंडन ने शनिवार को विधि विभागाध्यक्ष डॉ. दीपक शर्मा को निलंबित कर दिया। इससे पांच दिन पहले 28 सितंबर को कुलपति की ओर से डॉ. शर्मा को करीब 300 पन्नों का नोटिस जारी कर नौ बिंदुओं पर जवाब मांगा गया था। नोटिस में भर्ती से जुड़ी गोपनीय जानकारी मीडिया में लीक करने और नव-चयनित अभ्यर्थियों को कार्यभार ग्रहण न कराने समेत कई आरोप लगाए गए थे। अब इसी विवाद के बीच डॉ. शर्मा को निलंबित किए जाने से विश्वविद्यालय में प्रशासनिक टकराव और बढ़ गया है। नोटिस में नौ बिंदुओं पर मांगा गया था जवाब कुलपति की ओर से जारी नोटिस में डॉ. दीपक शर्मा से नौ बिंदुओं पर स्पष्टीकरण मांगा गया था। इसमें असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती प्रक्रिया से संबंधित गोपनीय जानकारी मीडिया तक पहुंचाने और चयनित अभ्यर्थियों को जॉइन न कराने जैसे आरोप शामिल थे। नोटिस के पांच दिन बाद निलंबन की कार्रवाई की गई है। हालांकि, निलंबन आदेश में लगाए गए आरोपों और उसके आधार की पूरी जानकारी सामने आने के बाद ही कार्रवाई की विस्तृत स्थिति स्पष्ट होगी। डॉ. शर्मा का आरोप- कुलपति तानाशाही कर रही हैं निलंबन के बाद डॉ. दीपक शर्मा ने कुलपति डॉ. उषा टंडन पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय में तानाशाही का माहौल है और वित्तीय अनियमितताएं की गई हैं। उनका आरोप है कि अपने अनुसार नियम बनाकर सरकारी धन का दुरुपयोग किया गया। डॉ. शर्मा ने दावा किया कि कुलपति को हर महीने वेतन के अतिरिक्त करीब 72 हजार रुपए का भुगतान किया जा रहा था, जिसे कुछ महीनों तक वित्त नियंत्रक ने रोक दिया था। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि विश्वविद्यालय के संचालन के लिए अभी तक आवश्यक बायलॉज तैयार नहीं किए गए हैं और कार्य परिषद में भी अपने फायदे के लिए नियम बनवाए गए। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। कुलपति या विश्वविद्यालय प्रशासन का इन आरोपों पर पक्ष सामने आने पर उसे भी खबर में शामिल किया जा सकता है। 12 असिस्टेंट प्रोफेसर पदों की भर्ती से शुरू हुआ विवाद पूरा विवाद जुलाई में शुरू हुई असिस्टेंट प्रोफेसर के 12 पदों की भर्ती प्रक्रिया को लेकर सामने आया था। डॉ. दीपक शर्मा और अन्य अधिकारियों का आरोप है कि नियमानुसार भर्ती प्रक्रिया रजिस्ट्रार के माध्यम से संचालित होनी चाहिए थी, लेकिन कुलपति ने रजिस्ट्रार को दरकिनार कर प्रक्रिया अपने स्तर से संचालित की। 31 जुलाई को चयन समिति की बैठक में यूजीसी के मानकों के पालन को लेकर सवाल उठे। इसके बावजूद 4-2 के बहुमत से प्रस्ताव पारित कर परिणाम जारी कर दिए गए। विवाद बढ़ने पर रजिस्ट्रार ने नियुक्ति पत्रों पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया। उनका कहना था कि भर्ती प्रक्रिया जांच के दायरे में है और मानकों से जुड़े सवालों का समाधान होने तक नियुक्ति पत्र जारी करना उचित नहीं होगा। रजिस्ट्रार को भी 46 पन्नों का नोटिस विवाद के बीच कुलपति की ओर से विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार वरुण पांडेय को भी 26 सितंबर को 46 पन्नों का नोटिस दिया गया था। इसमें नव-चयनित शिक्षकों को नियुक्ति पत्र जारी न करने और वार्डन का चार्ज नहीं लेने का आरोप लगाया गया था। रजिस्ट्रार का कहना था कि जब भर्ती प्रक्रिया पर ही सवाल उठ रहे हैं और इसकी जांच चल रही है तो वह नियुक्ति पत्रों पर हस्ताक्षर कैसे कर सकते हैं। इसी मामले में रजिस्ट्रार और विधि विभागाध्यक्ष के बीच भी मतभेद सामने आए। शासन स्तर पर तीन प्रमुख सचिवों की समिति कर रही जांच भर्ती प्रक्रिया को लेकर विवाद शासन स्तर तक पहुंच चुका है। मामले की जांच के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर वरिष्ठ आईएएस अधिकारी एम. देवराज की अध्यक्षता में तीन प्रमुख सचिवों की विशेष जांच समिति गठित की गई है। समिति ने 16 और 17 सितंबर को लखनऊ में चयन समिति के सदस्यों के बयान दर्ज किए। जांच में भर्ती प्रक्रिया, चयन समिति की कार्यवाही और नियमों के पालन से जुड़े पहलुओं को देखा जा रहा है। रजिस्ट्रार और विभागाध्यक्ष दोनों अवकाश पर विवाद और नोटिसों के बीच रजिस्ट्रार वरुण पांडेय और विधि विभागाध्यक्ष डॉ. दीपक शर्मा दोनों मेडिकल लीव पर चले गए हैं। दोनों अधिकारियों ने मामले की निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए विश्वविद्यालय के चेयरमैन एवं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और चांसलर एवं इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस अरुण भंसाली को लिखित शिकायत भी दी है। अब डॉ. दीपक शर्मा के निलंबन के बाद विवाद का अगला चरण विश्वविद्यालय प्रशासन और शासन स्तर पर होने वाली जांच की रिपोर्ट पर निर्भर करेगा। भर्ती प्रक्रिया पर उठे सवालों और एक-दूसरे पर लगाए जा रहे आरोपों के बीच विश्वविद्यालय प्रशासन का आधिकारिक पक्ष इस मामले में महत्वपूर्ण रहेगा।
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प्रयागराज की नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के विधि विभागाध्यक्ष सस्पेंड:बोले- कुलपति की तानाशाही और भ्रष्टाचार के खुलासे की सजा मिली