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9 जुलाई 1946 को जन्मे रामगोविन्द चौधरी की राजनीति की शुरुआत किसी पद या प्रतिष्ठा की तलाश में नहीं, बल्कि अन्याय के खिलाफ खड़े होने, छात्र हितों के लिए संघर्ष करने और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता से हुई। तीन भाइयों में सबसे बड़े रामगोविन्द चौधरी ने जीवन के शुरुआती संस्कार गांव के सामान्य परिवेश में पाए। प्रारंभिक शिक्षा गांव के प्राथमिक विद्यालय से लेने के बाद उन्होंने सिकंदरपुर से स्कूली शिक्षा पूरी की। उच्च शिक्षा के लिए सतीश चंद्र कॉलेज में बीएससी में प्रवेश लिया। पढ़ाई के साथ छात्र समस्याओं ने उन्हें आंदोलनों की ओर खींचा। छात्रों के अधिकारों और समस्याओं के समाधान के लिए सक्रिय रहने के कारण उन्हें महाविद्यालय से निष्कासित कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने श्री मुरली मनोहर टाउन स्नातकोत्तर महाविद्यालय, बलिया में प्रवेश लिया। यहीं से उनकी छात्र राजनीति ने व्यापक आंदोलन का रूप लेना शुरू किया। वर्ष 1972 में वे टाउन कॉलेज छात्रसंघ के महामंत्री निर्वाचित हुए। वर्ष 1974 में छात्रों ने उन्हें दोबारा अपना नेता चुना और वे छात्रसंघ अध्यक्ष बने। आपातकाल में संघर्ष और करीब 24 महीने जेल यह वह दौर था, जब देश का लोकतंत्र कठिन दौर से गुजर रहा था। आपातकाल के दौरान रामगोविन्द चौधरी ने लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष का रास्ता चुना। जेपी आंदोलन में वे जनपद छात्र युवा वाहिनी के सह-संयोजक रहे। आंदोलन के दौरान उनकी गिरफ्तारी के लिए इनाम घोषित किया गया। बाद में टीडी कॉलेज परिसर से उनकी गिरफ्तारी हुई। करीब 24 महीने जेल में रहने के बाद जब वे बलिया जेल से बाहर निकले, तो उनके राजनीतिक जीवन का एक नया अध्याय शुरू हुआ। जेल से रिहाई के दिन हुई चंद्रशेखर से मुलाकात रामगोविन्द चौधरी की रिहाई का दिन भी उनके राजनीतिक जीवन में अहम संयोग लेकर आया। उसी दिन बलिया कलेक्ट्रेट में पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर लोकसभा चुनाव के लिए नामांकन करने पहुंचे थे। रामगोविन्द चौधरी के साथ मौजूद छात्रों की भीड़ देखकर चंद्रशेखर ने उन्हें मिलने के लिए बुलाया। यह मुलाकात आगे चलकर आत्मीय संबंध और राजनीतिक मार्गदर्शन का आधार बनी। एक संघर्षशील छात्र नेता और समाजवादी चिंतक चंद्रशेखर के बीच बना यह संबंध रामगोविन्द चौधरी के राजनीतिक जीवन की दिशा तय करने वाले महत्वपूर्ण पड़ावों में शामिल रहा। 1977 में पहली बार विधानसभा पहुंचे वर्ष 1977 में उन्होंने तत्कालीन चिलकहर विधानसभा क्षेत्र से जनता पार्टी के प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की। इसके बाद लगातार पांच बार उन्होंने उस क्षेत्र का विधानसभा में प्रतिनिधित्व किया। उनके लिए राजनीति का उद्देश्य केवल चुनाव जीतना नहीं रहा। वे इसे समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने और उसकी आवाज को सत्ता के गलियारों तक ले जाने का माध्यम मानते रहे। मुलायम सिंह यादव की सरकार में संभाली मंत्री पद की जिम्मेदारी वर्ष 1991 में उन्हें मुलायम सिंह यादव के मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री बनाया गया। खाद्य प्रसंस्करण एवं उद्यान विभाग की जिम्मेदारी संभालते हुए उन्होंने शासन में भूमिका निभाई। वर्ष 2000 में वे समाजवादी जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष बने। वर्ष 2002 में उन्होंने बांसडीह विधानसभा क्षेत्र से समाजवादी जनता पार्टी के प्रत्याशी के रूप में, समाजवादी पार्टी के समर्थन से चुनाव लड़ा। इस चुनाव में उन्होंने तत्कालीन कैबिनेट मंत्री बच्चा पाठक को करीब 6 हजार मतों से हराया। वर्ष 2004 में मुलायम सिंह यादव के मंत्रिमंडल में उन्हें बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग का कैबिनेट मंत्री बनाया गया। 2007 में हार, 2012 में फिर विधानसभा पहुंचे राजनीतिक जीवन में उन्हें पराजय का सामना भी करना पड़ा। वर्ष 2007 में वे बांसडीह विधानसभा क्षेत्र से करीब 264 मतों के अंतर से चुनाव हार गए। हालांकि वर्ष 2012 में उन्होंने दोबारा जीत दर्ज की। अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली सरकार में उन्हें बेसिक शिक्षा तथा बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग का कैबिनेट मंत्री बनाया गया। बाद में उन्होंने समाज कल्याण और पंचायती राज जैसे महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी भी संभाली। वर्ष 2017 में उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी केतकी सिंह को करीब 1,655 मतों से हराया। इस जीत के बाद उन्हें उत्तर प्रदेश विधानसभा में नेता विरोधी दल की जिम्मेदारी मिली। हालांकि वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में केतकी सिंह ने उन्हें पराजित किया। शिक्षा और पंचायत से जुड़े फैसलों पर रहा जोर रामगोविन्द चौधरी की पहचान केवल विधायक या मंत्री के तौर पर नहीं रही। उनके कार्यकाल में शिक्षा, शिक्षक और ग्रामीण लोकतंत्र से जुड़े कई फैसले सामने आए। बेसिक शिक्षा मंत्री के रूप में शिक्षकों के खातों में सीधे ऑनलाइन वेतन भेजने की व्यवस्था, शिक्षामित्रों के समायोजन तथा सहायता प्राप्त जूनियर हाईस्कूलों में पदों से अधिक कार्यरत शिक्षकों के अधिसंख्य पदों पर समायोजन जैसे फैसले उनके कार्यकाल की प्रमुख पहलों में गिने जाते हैं। पंचायती राज मंत्री के रूप में ग्राम प्रधानों और ब्लॉक प्रमुखों को मानदेय देने की व्यवस्था भी उनके कार्यकाल के महत्वपूर्ण फैसलों में शामिल रही। चुनावी आंकड़ों से आगे रही राजनीतिक पहचान रामगोविन्द चौधरी के राजनीतिक जीवन को केवल चुनावी जीत-हार के आंकड़ों से नहीं समझा जा सकता। छात्र जीवन में सवाल उठाने से शुरू हुई उनकी यात्रा आपातकाल के दौरान जेल जाने, विधानसभा में लंबे समय तक प्रतिनिधित्व करने और सरकार में मंत्री पद संभालने तक पहुंची। उन्होंने चंद्रशेखर के सानिध्य से राजनीतिक संस्कार पाए, मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में सरकार में जिम्मेदारियां निभाईं और अखिलेश यादव के नेतृत्व में विधानसभा में नेता विरोधी दल की भूमिका संभाली। उनकी राजनीतिक यात्रा का एक पक्ष संघर्ष है तो दूसरा समाजवाद और जनसरोकार से जुड़ाव। यही वजह है कि उनके जीवन को केवल पदों और चुनावी परिणामों के जरिए देखना उनके राजनीतिक सफर को सीमित कर देना होगा। संघर्ष से निकला नेतृत्व, समाजवाद से जुड़ी आस्था और जनसेवा को समर्पित जीवन—रामगोविन्द चौधरी की राजनीतिक यात्रा की पहचान इन्हीं तीन सूत्रों में दिखाई देती है।
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रामगोविन्द चौधरी का राजनीतिक सफर:छात्र आंदोलन से विधानसभा तक पहुंचे, आपातकाल में 24 महीने जेल, चंद्रशेखर से मुलाकात ने बदली सियासत की राह