Supreme Court Orders SIT Probe in 2012 Karnataka Rape Murder Case

2 मिनट पहले

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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कर्नाटक के धर्मस्थला में 2012 के बलात्कार-हत्या केस की दोबारा जांच का आदेश दिया। यह मामला 17 साल की छात्रा से जुड़ा है।

जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की बेंच ने कर्नाटक सरकार को स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) बनाने को कहा। SIT को जांच तीन महीने में पूरी करनी होगी।

कोर्ट ने कहा कि जांच पूरी होने के बाद संबंधित अदालत में कानून के मुताबिक पुलिस रिपोर्ट दाखिल की जाए। बेंच ने जांच के तरीके पर कहा कि इससे कोर्ट की अंतरात्मा तक झकझोर गई है।

मां की याचिका पर आया आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश पीड़िता की मां की याचिका पर दिया। 17 साल की छात्रा 9 अक्टूबर 2012 को कॉलेज से घर लौटते समय लापता हो गई थी।

वह धर्मस्थला के पास उजिरे में पढ़ती थी। अगले दिन उसका शव मिला। शव पर यौन हमले और हत्या के सबूत मिले थे।

SIT में पुराने जांच अधिकारियों को जगह नहीं

कोर्ट ने कहा कि कर्नाटक सरकार आधुनिक जांच तकनीक के इस्तेमाल में माहिर और सक्षम जांच अधिकारियों की SIT बनाए। इसका नेतृत्व राज्य का कोई वरिष्ठ पुलिस अधिकारी करे।

बेंच ने साफ कहा कि बेलथंगडी पुलिस स्टेशन, कर्नाटक CID या CBI की पुरानी जांच टीमों का हिस्सा रहे किसी अधिकारी को SIT में शामिल नहीं किया जाएगा।

स्थानीय पुलिस से CBI तक हुई जांच

इस मामले की जांच स्थानीय पुलिस ने की थी। इसके बाद कर्नाटक CID और फिर CBI ने जांच की।

CBI की स्पेशल कोर्ट ने जून 2023 में मामले में आरोपी बनाए गए एकमात्र व्यक्ति संतोष राव को सबूतों की कमी के कारण बरी कर दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिस FIR में संतोष राव पर मुकदमा चला और उन्हें बरी किया गया, उसमें अब उनके खिलाफ दोबारा जांच या मुकदमा नहीं चलाया जाएगा।

कोर्ट ने जांच के तरीके पर सवाल उठाए

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 17 साल की नाबालिग लड़की के साथ बेरहमी से बलात्कार और हत्या के मामले में जांच जिस तरह आगे बढ़ी, वह गंभीर चिंता की बात है।

कोर्ट ने कहा कि अलग-अलग जांच एजेंसियों ने जिस तरह जांच की और सबूत जुटाकर उनका आकलन किया, उससे कोर्ट की अंतरात्मा तक झकझोर गई है।

बेंच ने कहा कि जिस व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा चलाया गया, उसे अपराध करने में अक्षम माना गया। इससे साफ है कि जांच ऐसे तरीके से हुई, जिससे पीड़िता के साथ अन्याय हुआ।

कोर्ट ने कहा कि असली अपराधियों ने जांच को प्रभावित किया हो, इसकी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसी ढीली और गलत जांच उन जांच अधिकारियों को फायदा पहुंचाती है, जिन्होंने अपना काम सही और पूरी ईमानदारी से नहीं किया।

पीड़िता को न्याय दिलाना समाज का कर्तव्य

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गलत तरीके से आरोपी बनाए गए व्यक्ति के साथ हुए अन्याय की भरपाई की जा सकती है। लेकिन बेरहमी से बलात्कार और हत्या की शिकार पीड़िता के साथ हुआ अन्याय कभी पूरा नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने कहा कि अगर समाज ऐसे जघन्य अपराध की पीड़िता को सही जांच और असली अपराधियों को सजा दिलाकर न्याय नहीं देता, तो वह अपना कर्तव्य निभाने में असफल होगा।

बेंच ने यह भी कहा कि संवैधानिक अदालतों के पास आगे की जांच या दोबारा जांच का आदेश देने की शक्ति, न्यायिक समीक्षा के अधिकार का एक महत्वपूर्ण और बदलता हुआ हिस्सा है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आदेश में कही गई किसी बात को किसी व्यक्ति की भूमिका पर शुरुआती राय नहीं माना जाएगा। SIT को आदेश में मामले के गुण-दोष पर कही गई किसी बात से प्रभावित हुए बिना जांच करनी होगी।

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