पंजाब की महिला का गौरैया से प्यार:टूटे दरवाजे पर घोंसला देखा तो घर में बसा दीं 250 गौरैया; हथेली पर बैठकर खातीं दाना


“ये गौरैया मेरी जान हैं। मेरी कोई बेटी नहीं है, इसलिए मैंने इनको ही अपनी बेटियां बना लिया है। मैं हमेशा इनको बेटी कहकर बुलाती हूं। लाड में मैं इन्हें अपनी राजकुमारियां कहती हूं।” ये कहना है पंजाब के मोगा में निधावाला गांव की रहने वाली हरप्रीत कौर का। हरप्रीत घर और आसपास गौरैयाओं के लिए घोंसले बना रही हैं। उनके घर में इस वक्त कम से कम 175 घोंसले लगे हैं। इनमें करीब 200 से 250 गौरैया रहती हैं। घर और पेड़ों पर बनाए गए ये कृत्रिम घोंसले अब इन गौरैयाओं का आशियाना बन चुके हैं। हरप्रीत का घर हर वक्त गौरैयाओं की चहचहाहट से गूंजता रहता है। वह इनके लिए दाना-पानी का भी इंतजाम करती हैं। उनका कहना है कि ये गौरैया अब उनकी जिंदगी जीने का मकसद बन गई हैं। ऑपरेशन के बाद लेटी थी, टूटे दरवाजे पर दिखा घोंसला
हरप्रीत बताती हैं कि साल 2013 में उनका ऑपरेशन हुआ था। वह घर में लेटी रहती थीं। इसी दौरान एक दिन उनकी नजर घर के पुराने टूटे दरवाजे पर गई। वहां गौरैया ने घोंसला बना रखा था। वह घंटों गौरैया को देखती रहती थीं। धीरे-धीरे इन पक्षियों से लगाव हो गया। जब उन्हें पता चला कि कई जगहों पर गौरैया की संख्या घट रही है तो उन्होंने इन्हें बचाने की ठानी। इसके बाद इनके लिए दाना-पानी का इंतजाम करने लगीं। धीरे-धीरे गौरैया उनसे घुल-मिल गईं और पास आने लगीं। पुराना घोंसला टूटा तो गत्ते के डिब्बे को बनाया आशियाना
हरप्रीत बताती हैं कि एक बार गौरैया के घोंसले वाला पुराना दरवाजा तोड़कर नया लगाया गया तो उनका घोंसला भी टूट गया। मैंने सोचा कि अब उन्हें दोबारा घोंसला बनाने में कितनी परेशानी होगी। तब मैंने उनके लिए गत्ते का एक डिब्बा रखा। उसमें एक छेद किया और उसे उनके रहने की जगह बना दिया। कुछ ही समय में गौरैयाओं ने उसे अपना घर बना लिया। उन्होंने उसमें अंडे दिए और बाद में वहीं बच्चों का जन्म हुआ। धीरे-धीरे गौरैयाओं ने उस आशियाने का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। इससे उत्साहित होकर मैंने एक-दो और डिब्बे लगा दिए, जहां उन्होंने सुरक्षित तरीके से अपने बच्चों को बड़ा किया। मैंने अपनी जिंदगी गौरैयाओं के लिए समर्पित कर दी है
हरप्रीत कहती हैं कि उनके गांव और घर में अब गौरैया रहती हैं और वह उन सभी की देखभाल करती हैं। मैंने अपनी जिंदगी अब इन गौरैयाओं के लिए समर्पित कर दी है। इनको छोड़कर कहीं भी नहीं जाती। जाना भी होता है तो उसी दिन लौट आती हूं। मेरे घर में इस वक्त कम से कम 175 घोंसले लगे हैं। इन घोंसलों में करीब 200 से 250 गौरैया रहती हैं। इसके अलावा गांव भर से कई और पक्षी यहां रोज खेलने और दाना खाने के लिए आते हैं। सुबह उठते ही देखती हूं- पानी ताजा है या नहीं
हरप्रीत बताती हैं कि हर सुबह उठने के बाद उनका पहला काम यह देखना होता है कि पक्षियों के लिए ताजा पानी है या नहीं। नहीं हो तो वह ताजा पानी इनके कसोरों में डालती हैं। हर सुबह पहले वह इनके मिट्टी के बर्तनों को साफ करती हैं, ताकि इन्हें हर समय ताजा और साफ पानी मिले। दूसरे पक्षी भी यहीं आकर पानी पीते हैं तो उन्हें सुकून मिलता है। मौसम के हिसाब से देती हैं दाना
हरप्रीत कहती हैं कि जब मैंने इनको बेटियां माना है तो देखभाल भी बेटियों की तरह करती हूं। मेरी बेटियां बहुत सेंसेटिव और नाजुक हैं। इनके दाने का ख्याल मौसम के हिसाब से रखती हूं। गर्मियों में मैं उन्हें कंगनी और बासमती चावल खिलाती हूं, जबकि सर्दियों में गेहूं और बाजरा देती हूं। गर्म तासीर होने के चलते गर्मियों में बाजरा नहीं देती। मैं दाना पूरे घर में बिखेरती हूं, ताकि सभी पक्षी बिना लड़ाई-झगड़े के आसानी से भरपेट दाना खा सकें। ये पक्षी अब मेरे साथ इतना घुल-मिल गए हैं कि मेरी हथेली में दाना खाने के लिए बैठ जाते हैं। मेरी जिंदगी को इन गौरैयाओं ने सकारात्मक बना दिया
हरप्रीत कहती हैं कि इन पक्षियों को पालने और उनके संपर्क में आकर वह सकारात्मक हो गई हैं। जब वह बीमार रहती थीं तो बहुत सारी निगेटिविटी मन में घर कर गई थी। अब मेरी इन राजकुमारियों ने मेरी जिंदगी बदल दी है। इनसे बातें करते हुए मैं पॉजिटिविटी महसूस करती हूं। इनके साथ दिन कब बीत जाता है, पता ही नहीं चलता। अब तो हाल ये हो गया है कि मेरा मन इनके बिना कहीं लगता ही नहीं है। मेरा परिवार भी मुझे इनकी देखभाल करने में पूरा सहयोग देता है। मेरा एक बेटा और सैकड़ों बेटियां हैं
हरप्रीत कहती हैं कि मेरा एक ही बेटा है। लेकिन ये पक्षी मेरी बेटियों की तरह हैं। मेरे जीवन में सैकड़ों बेटियां हैं। मैं ही इनको बेटियां नहीं मानती, मेरी बेटियां भी मुझे मां की तरह प्यार देती हैं। मैं इनको इनकी भाषा में ही बुलाती हूं। मैंने इनकी तरह चहचहाना सीख लिया है। जैसे ही मैं उनको आवाज लगाती हूं तो ये कहीं से भी उड़कर मेरे पास आ जाती हैं। इन्होंने मेरे जीवन में बेटियों की कमी को दूर किया है और मेरी जिंदगी का अहम हिस्सा हैं। मैं इनके साथ हंसकर या रोकर अपनी खुशी और गम साझा करती हूं।
कीकर के पेड़ लगाएं लोग, सरकार करे संरक्षण
मोगा में निधावाला गांव की रहने वाली हरप्रीत कौर ने बताया कि सरकार ने चाहे उनके काम को कभी नहीं सराहा, लेकिन उनकी सरकार से एक ही अपील है कि गौरेया को बचाने के लिए कीकर के पड़ों को पंजाब में संरक्षण करें। कीकर के पौधे गांव-गांव में लगाए जाएं। ताकि इन चिड़ियों को बसेरा मिल सके। हरप्रीत ने बताया कि कीकर की बात इसलिए क्योंकि ये चिड़िया कांटेदार और झाड़ी वाले पेड़ पर रहना पसंद करती है। इसे घोसला बनाना पसंद नहीं है। ये पत्तों के बीच छिपकर बैठी रहती हैं। गांवों से कीकर के पेड़ खत्म होने के चलते भी गौरेया लुप्त हो रही है क्योंकि इनके पास रहने का ठिकाना ही नहीं बचा है।
चिड़ियों को संभालने के लिए बहन की शादी में नहीं गई
हरप्रीत कौर कहती हैं कि चिड़ियों से उनको इतना लगाव है कि वह अपनी बहन की शादी में कनाडा नहीं जा पाई। उसका वीजा तक लग गया था लेकिन ऐन मौके पर उसने अपने पति को वहां पर भेज दिया लेकिन खुद चिड़ियों को छोड़कर जाने का मन नहीं माना। हरप्रीत कहती हैं कि फाजिल्का में मायके भी जाना होता है तो वह जल्दी वहां से लौट आती हैं। इन गौरेया के बिना उसका कहीं भी दिल नहीं लगता।
शुरू में विरोध हुआ लेकिन अब पूरा गांव साथ दे रहा
हरप्रीत ने बताया कि कोई भी काम शुरूआत में आसान नहीं होता। आज उनका नाम हो गया है लेकिन इसके पीछे बहुत संघर्ष रहा है। शुरूआत में जब उसने चिड़ियों को बचाना शुरू किया तो गांव के ही कई लोग कह देते थे कि तुम किस काम में पड़ गई हो। लेकिन आज सबको समझ आ गया है। अब सब लोग मेरे साथ गौरेया को बचाने के काम में लगे हैं।
फसलों में पेस्टिसाइड, छत वाले पंखे पहुंचा रहे नुकसान
हरप्रीत कौर ने बताया कि ये आम बात लोग कह देते हैं कि मोबाइल टावरों के चलते चिड़िया गायब हो रही हैं। लेकिन ऐसे कुछ भी नहीं है। सबसे बड़ा कारण फसलों पर कीटनाशन की स्प्रे और छतों वाले पंखे हैं। उन्होंने बताया कि ये चिड़िया घरों में रहना पसंद करती है। छतों वाले पंखे से टकराने के चलते इनको नुकसान पहुंचता है। इसके साथ ही ये चिड़िया अपने बच्चे को पहले एक हफ्ते तक कीड़े खिलाती है। फसलों से लाए गए इन कीड़ों पर कीटनाशकों का असर रहता है जिससे बच्चे मर जाते हैं। पक्षी प्रेमी संदीप सिंह धौला के घोसले बने रैन बसेरा
हरप्रीत कौर बताती हैं कि गौरेया को बचाने में पक्षी प्रेमी संदीप धौला का भी बड़ा योगदान है। इनके डिजाइन किए घोसले भी गौरेया को बचाने में बड़ा योगदान दे रहे हैं। आज वह इनके सैकड़ों घोसलों का यूज कर रही हैं। इसके साथ ये पंजाब में जगह-जगह घोसले लगाते हैं जिससे इस चिड़िया को रहने के लिए घर मिलता है।
हमारे घर में दादा-दादी के साथ एक चिड़िया भी रहती थी
हरप्रीत ने युवाओं को संदेश देते हुए कहा कि कोई वक्त था जब हमारे घर कच्चे होते थे। इन घरों में हमारे दादा-दादी के साथ एक चिड़िया भी रहती थी। नौजवानों को इस चिड़िया को बचाने के लिए आगे आना चाहिए। इनको अपने घरों में पनाह देनी चाहिए ताकि पर्यावरण संरक्षण में योगदान देकर इसे बचाया जा सके।

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