'नेता साथ छोड़ रहे, आपको लड़ना होगा…':प्रशांत किशोर की हार लगभग तय, फिर बांकीपुर से चुनावी मैदान में क्यों कूदे; अंदर की पूरी कहानी


भाजपा के गढ़ में हार तय होने के बावजूद प्रशांत किशोर उपचुनाव क्यों लड़ रहे हैं? यह सवाल बिहार में सबसे ज्यादा चर्चा में है। इसी को जानेंगे, आज बूझे की नाही में… …क्यों कहा जा रहा है कि प्रशांत किशोर की हार तय है? इसका जवाब जानने के लिए आपको बांकीपुर विधानसभा के चुनावी गणित को समझना होगा। 3.79 लाख वोटरों वाले बांकीपुर विधानसभा सीट पर भाजपा 1995 से कोई भी चुनाव नहीं हारी है। और वोट हमेशा 50% से ज्यादा मिला है। भाजपा मजबूत क्यों… भाजपा जमीन पर कितनी मजबूत है, इसका आइडिया प्रशांत किशोर को भी है। तभी तो उन्होंने पत्रकारों से कहा, ‘RJD-कांग्रेस के सपोर्ट करने से हम नहीं जीतेंगे। हमने काफी मुश्किल सीट चुनी है। हमारी जीत तब होगी जब लंबे समय से भाजपा को वोट दे रहा एक बड़ा तबका बदलाव के नाम पर हमको वोट देगा।’ हालांकि, चुनाव में कागजी गणित से ज्यादा जमीन पर केमिस्ट्री मायने रखती है। इसलिए अभी कहना कि प्रशांत किशोर हार ही जाएंगे, उचित नहीं है। हार तय होने के बावजूद प्रशांत किशोर क्यों लड़ रहे उपचुनाव प्रशांत किशोर इसे सिर्फ एक सीट का उपचुनाव भर नहीं मानते हैं। वह कह रहे हैं कि यह उपचुनाव बिहार के आगे की राजनीति तय करने वाला चुनाव है। वहीं, पॉलिटिकल एनालिस्टों का कहना है- यह बिहार की राजनीति तय करने वाला चुनाव है कि नहीं, यह तो समय बताएगा। लेकिन इतना जरूर है कि यह चुनाव प्रशांत किशोर को बिहार में अपनी राजनीति की दूसरी पारी को जिंदा रखने, साख कायम करने का जरिया जरूर बन सकता है। पूरी बात को 2 पॉइंट में समझिए… 1. जनसुराज पार्टी को बचाने के लिए चुनाव में उतरे सूत्रों के मुताबिक, 14 नवंबर 2025 को आए बिहार विधानसभा चुनाव के रिजल्ट के बाद जन सुराज पार्टी के कार्यकर्ताओं में भारी निराशा थी। लोग साथ छोड़ रहे थे। इसको लेकर पार्टी खासा चिंतित थी। कार्यकर्ताओं के अंदर की इस निराशा को दूर करने के लिए रणनीति बनाई जा रही थी, तभी मार्च में बांकीपुर विधानसभा सीट पर उपचुनाव होना तय हो गया। इसके बाद पार्टी के कोर ग्रुप के मेंबरों ने प्रशांत किशोर को चुनाव लड़ने का सुझाव दिया। उन्हें बताया गया कि वापस पार्टी के कार्यकर्ताओं में जोश भरने के लिए आपको मैदान में उतरना होगा। अगर आप (प्रशांत किशोर) चुनावी मैदान में उतरे तो बिना खर्च की पब्लिशिटी होगी और कार्यकर्ताओं में जोश आएगा। चूंकि इस चुनाव के बाद फिलहाल कोई चुनाव संभावित नहीं था। सीधे नवंबर में स्नातक कोटे की विधान परिषद की सीट पर चुनाव होना था। बताया जा रहा है कि प्रशांत किशोर ने पार्टी के कोर ग्रुप के सुझाव को माना और अपनी रणनीति को धार देने और जनता के बीच माहौल बनाने के लिए अप्रैल से पार्टी ने बांकीपुर में छोटी-छोटी बैठक और सर्वे करना शुरू किया। इससे जनता के बीच धीरे-धीरे चर्चा शुरू हुई और आखिर में 5 जुलाई को प्रशांत किशोर के चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया गया। हार के बाद 3 बड़े लोगों ने छोड़ा साथ बिहार विधानसभा चुनाव में बुरी तरह हार के बाद 3 बड़े नेताओं ने प्रशांत किशोर का साथ छोड़ दिया। 2. भाजपा को सीधी चुनौती देकर नैरेटिव सेट करना खुद प्रशांत किशोर कहते हैं- ‘यह उपचुनाव सिर्फ एक सीट का चुनाव नहीं है, सम्राट चौधरी के खिलाफ भी जनमत टेस्ट है। क्योंकि नीतीश कुमार के नाम पर वोट लेकर भाजपा ने अपना आदमी सेट किया है। यहां अगर भाजपा हारी तो इसकी गूंज दिल्ली तक सुनाई देगी।’ मतलब प्रशांत किशोर इस चुनाव को सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली NDA सरकार के कामकाज का लिटमस टेस्ट मान रहे हैं। और ऐसा ही प्रचारित भी कर रहे हैं। पॉलिटिकल एनालिस्ट संजय सिंह कहते हैं- ‘प्रशांत किशोर पर अब तक भाजपा का मददगार होने का ठप्पा विपक्षी पार्टियां लगाती रही हैं। उन्होंने सीधे गढ़ में चुनौती देकर यह जताने का प्रयास किया है कि हम मिले हुए नहीं हैं। हमारी तरह भाजपा को घर में घुसकर सीधी चुनौती देने की ताकत तेजस्वी यादव के पास भी नहीं।’ संजय सिंह कहते हैं- ‘ऐसा करके प्रशांत किशोर दो तरह के समीकरण को प्रभावित कर रहे हैं। बांकीपुर का एक इतिहास यह भी

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