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‘हम 1947 में लाहौर से फाजिल्का (पंजाब)आए थे। फिर हरियाणा में रहे और शादी के बाद बिहार चले गए। कोविड में मेरे दोनों बेटों की मौत हो गई। बहू जेवर और पैसे लेकर चली गई। जो थोड़ी संपत्ति और बचे हुए जेवर थे, वो बेटी को दे दिए। उसके बाद बेटी मुझे यहां छोड़ गई। अब इस वृद्धाश्रम में रहते हुए 12 साल हो गए हैं। यही अब मेरा परिवार है।’ ये कहना है 87 वर्षीय आदर्श आनंद का। आज मदर्स डे है। इस दिन हम बात कर रहे हैं उन ‘अनदेखी मांओं’ की, जो वृद्धाश्रमों में एक-दूसरे का सहारा बनकर जिंदगी काट रही हैं। कोई बेटे के होते हुए भी अकेली है, तो किसी को अपनों ने ही बेसहारा छोड़ दिया। लेकिन इन सबके बीच ये महिलाएं एक-दूसरे को छोटे बच्चों की तरह संभाल रही हैं। मदर्स डे पर दैनिक भास्कर की टीम कानपुर के पनकी स्थित स्वराज वृद्धा आश्रम पहुंची। इस आश्रम की शुरुआत मंजू भाटिया ने की थी। खास बात यह है कि कानपुर में संचालित यह वृद्धाश्रम पूरी तरह निशुल्क है। यहां वर्तमान में 32 बुजुर्ग रह रहे हैं, जिनमें 19 महिलाएं हैं। सबसे खास बात यह है कि यहां बुजुर्गों की देखभाल के लिए कोई अलग स्टाफ नहीं है। यहां रहने वाले बुजुर्ग ही एक-दूसरे की मदद करते हैं और परिवार की तरह साथ रहते हैं। मंदिर में भजन, फिर साथ बैठकर गुजरता है दिन
वृद्धाश्रम में प्रवेश करते ही सामने एक छोटा मंदिर दिखाई देता है। वहां कुछ बुजुर्ग महिलाएं भजन गा रही थीं, जबकि अन्य बुजुर्ग शांत बैठकर उन्हें सुन रहे थे। माहौल में एक अजीब सुकून था, लेकिन चेहरों पर जिंदगी के संघर्ष भी साफ झलक रहे थे। इसी दौरान आश्रम के मैनेजर संजय मेहता से बातचीत हुई। उन्होंने बताया- यहां सुबह सभी लोग एक साथ पूजा-पाठ करते हैं। उसके बाद भजन होता है। फिर सभी अपने कमरों में आराम करने चले जाते हैं। समय पर सभी को खाना, चाय और रात का भोजन दिया जाता है। यहां रहने वाले लोग ही एक-दूसरे का परिवार हैं। पढ़िए पूरी रिपोर्ट…. 7 साल की उम्र में देश विभाजन का दर्द देखा
स्वराज वृद्धा आश्रम में रहने वाली 87 वर्षीय आदर्श आनंद ने कहा- मैं मूल रूप से पाकिस्तान के लाहौर के पास एक गांव की रहने वाली हूं। वर्ष 1947 में देश के विभाजन के दौरान मेरा परिवार पंजाब के फाजिल्का (फिरोजपुर) स्थित कैंप में आकर बस गया था। उस समय मेरी उम्र केवल 7 साल थी। बाद में हमारा परिवार हरियाणा आ गया, जबकि कुछ रिश्तेदार हिमाचल प्रदेश और पंजाब में बस गए। मेरे पिता की बैंक में नौकरी लग गई, जिसके चलते परिवार सिरसा, हिसार और रोहतक जैसे शहरों में रही। शादी के बाद बिहार में रहने लगी
साल 1960 में मेरी शादी बिहार के पटना में हुई। शादी के बाद मैं वहीं रहने लगी। शुरुआती जीवन सामान्य रहा। मेरी पहली संतान बेटी थी, जिससे परिवार खुश नहीं था। उन्होंने कहा-जब बेटी हुई तो मेरे ससुर नाराज हो गए थे, उन्हें बेटे की चाह थी। इसके बाद मैंने दो बेटों और चार बेटियों को जन्म दिया। लेकिन शादी के मात्र आठ साल बाद पति का बीमारी के कारण निधन हो गया। इसके बाद पूरे परिवार की जिम्मेदारी मेरे कंधों पर आ गई। रिश्तेदारों की मदद से मैंने अपनी चार बेटियों और एक बेटे की शादी कराई। हालांकि दूसरा बेटा गंभीर रूप से बीमार था, इसलिए उसकी शादी नहीं की गई। हम नहीं चाहते थे कि किसी लड़की की जिंदगी प्रभावित हो, इसलिए उसका विवाह नहीं कराया। बेटी ने आश्रम में छोड़ दिया
2000 के दशक तक सब कुछ सामान्य चलता रहा। इसी दौरान मेरे बेटे का निधन हो गया। बेटे की मौत के बाद बहू घर से जेवर और पैसे लेकर चली गई और फिर कभी वापस नहीं लौटी। उस समय मेरी उम्र 60 साल से अधिक हो चुकी थी। बढ़ती उम्र और अकेलेपन के बीच मेरी बेटी ने मेरा सहारा बनने का भरोसा दिया। मैंने अपनी संपत्ति, जेवर और बची हुई जमा पूंजी बेटी और दामाद को सौंप दी, यह सोचकर कि बुढ़ापे में वही मेरा सहारा बनेंगे। लेकिन जब मेरे पास कुछ नहीं बचा, तो वर्ष 2015 में बेटी मुझे सर्वसमाज वृद्धा आश्रम में छोड़ गई। अब 12 साल से मैं इसी आश्रम में रह रही हूं। बेटी कभी-कभी मिलने आती है, लेकिन फोन नहीं करती। अब यही लोग मेरा परिवार हैं, यही मेरा ख्याल रखते हैं। बहू ने घर से निकाल दिया, अब वृद्धाश्रम में रहीं राजकिशोरी
कानपुर के गुमटी नंबर-5 में रहने वाली 76 वर्षीय राजकिशोरी मूल रूप से सरसौल की रहने वाली हैं। उनकी शादी गुमटी नंबर-5 इलाके में हुई थी। शादी के बाद उन्होंने तीन बेटियों और एक बेटे को जन्म दिया।
शादी के करीब 24 साल बाद उनके पति का निधन हो गया। इसके बाद उन्होंने अपनी तीनों बेटियों और इकलौते बेटे की शादी कराई। कुछ समय तक परिवार में सब कुछ ठीक चलता रहा, लेकिन बाद में बहू उन्हें परेशान करने लगी। अस्पताल में एडमिट हुई तो छोड़ के भागा बेटा
राजकिशोरी ने बताया-एक दिन बेटा और बहू मुझे वृद्धाश्रम छोड़ गए। अब करीब एक साल से मैं यहीं रह रही हूं। मेरी छोटी बेटी मुझसे मिलने आती है। उसकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है, इसलिए मुझे जो पेंशन मिलती है, उसमें से 2 हजार रुपये मैं उसे दे देती हूं। बाकी बचे 1 हजार रुपये से अपना खर्च चलाती हूं। यहां के लोग बहुत अच्छे हैं, अब यही लोग मेरे परिवार जैसे हैं। कुछ दिन पहले मेरी तबीयत ज्यादा खराब हो गई थी। रात में मुझे अस्पताल में भर्ती कराया गया। वहां मेरा बेटा मुझे देखने आया, लेकिन हालचाल पूछने की बजाय वह जेवर की बात करने लगा। इसके बाद मैंने उसे वहां से भगा दिया। वृद्धाश्रम के एडमिन बोले- यहां रहने वाले सभी बुजुर्ग निशुल्क रहते हैं
एडमिन संजय मेहता ने कहा- यहां रहने वाले सभी बुजुर्गों की गारंटी के तौर पर उनके परिवार की जानकारी ली जाती है। यहां रहने वाले अधिकतर बुजुर्गों को उनके परिवार और बेटों ने छोड़ दिया है। इन सभी के रहने, खाने-पीने और दवाइयों आदि की जिम्मेदारी हमारी ही है। हम लोग सुबह 7 बजे चाय, 9 बजे नाश्ता, जिसमें 200 एमएल दूध दिया जाता है, दोपहर 1:30 बजे लंच और रात 8 बजे डिनर देते हैं। नाश्ते में मीठा दलिया, नमकीन दलिया, पोहा आदि और खाने में दाल, रोटी व चावल दिए जाते हैं। यहां अधिकतर बुजुर्ग कानपुर और आसपास के क्षेत्रों के रहने वाले हैं। यहां रहने आने वाले लोगों का सबसे पहले आधार कार्ड में पता अपडेट कराया जाता है। इसके बाद उनका राशन कार्ड और फिर वृद्धावस्था पेंशन शुरू करवाई जाती है। इससे उनका व्यक्तिगत खर्च चलता रहता है। कुछ लोग अपनी पेंशन का पैसा अपने बच्चों के परिवार की गुजर-बसर के लिए भी दे देते हैं। यहां रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य की देखभाल के लिए दो डॉक्टर भी आते हैं। अधिक समस्या होने पर उनका अस्पतालों में इलाज कराया जाता है। वृद्धाश्रम में बुजुर्गों की देखभाल के लिए दो डॉक्टर मौजूद रहते हैं। लेकिन जब किसी की हालत ज्यादा गंभीर हो जाती है, तो उन्हें नारायणा हॉस्पिटल या कुलवंती हॉस्पिटल में भर्ती कराया जाता है। इसके बाद हम उनके परिवार वालों को सूचना देते हैं। लेकिन कई लोग अस्पताल तक आना भी जरूरी नहीं समझते। कुछ दिन पहले आश्रम में रहने वाले एक बुजुर्ग का निधन हो गया था। परिवार वालों को सूचना दी गई, लेकिन कोई भी वहां नहीं पहुंचा। कई लोग यह सोचकर दूरी बना लेते हैं कि कहीं अंतिम संस्कार का खर्च उन्हें न उठाना पड़ जाए। वृद्धाश्रम के मैनेजर बोले- यहीं पर पति-पत्नी रहते हैं
वृद्धाश्रम के मैनेजर संतोष कुमार चौधरी हैं। उनका जन्म मुंबई में हुआ था। उनके परिवार में बेटा और बेटी दोनों हैं। पुराने दिनों को याद करते हुए संतोष ने बताया- हमने जबलपुर ऑर्डिनेंस फैक्ट्री, हरियाणा के रोहतक, गाजियाबाद और कानपुर के एलिमको में नौकरी की है। दिसंबर 1957 में यह फैक्ट्री शुरू हुई थी, तभी हमें यहां नौकरी मिली थी। मेरी शादी को 61 साल हो चुके हैं। यहां पर मेरी पत्नी भी रहती हैं। अब मेरे परिवार में कोई नहीं है। हम दोनों अब यहीं रहते हैं। मैं यहां अकाउंट्स का काम देखता हूं। धीरे-धीरे यहीं जिंदगी कट जाएगी। यही अब मेरा परिवार है। जिले में एक वृद्धा आश्रम होना चाहिए
वरिष्ठ पत्रकार राजेश मिश्रा ने कहा- हर महिला रानी लक्ष्मीबाई का स्वरूप होती है। इसका संदेश महिलाओं के सम्मान और उनकी भूमिका को दर्शाने के लिए दिया गया है। जब बेटी घर में जन्म लेती है, तो परिवार उसे प्यार से ‘रानी बिटिया’ कहकर पुकारता है। वही बेटी शादी के बाद परिवार की ‘लक्ष्मी’ बन जाती है। इसके बाद जब वह मां बनती है, तो एक ‘बाई’ की तरह अपने बच्चों और परिवार की देखभाल करती है। लेकिन समाज की सोच अब काफी बदल चुकी है। आजकल के बच्चों को अपने माता-पिता की चिंता ही नहीं रह गई है। आज की पीढ़ी बुजुर्ग होते माता-पिता को जिम्मेदारी की बजाय बोझ समझने लगी है। उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा विधवा आश्रम मथुरा में है, लेकिन उसकी क्षमता करीब 1000 लोगों की ही है। इसके अलावा कई बुजुर्ग वाराणसी में रहना पसंद करते हैं। उन्होंने सरकार के फैसले को सही बताते हुए कहा कि आने वाले समय की जरूरत को देखते हुए वृद्धाश्रमों की क्षमता बढ़ाने पर भी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
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मदर्स डे पर ‘अनदेखी मांओं’ की कहानी:कानपुर में वृद्धाश्रम में एक दूसरे का रख रहे ख्याल, प्रॉपर्टी लेने के बाद छोड़ गए बच्चे